शिक्षक-शिक्षण का रूप’ एक दीर्घ कालिक प्रक्रिया थी। गुरुकुल व्यवस्था के अन्तर्गत गुरुकुल में ही वास करने वाले अनेक अन्तेवासी गुरुकुल में रहते हुए सैद्धान्तिक एवं व्यावहारिक दृष्टि से निरन्तर शिक्षण एवं प्रशिक्षण प्राप्त करते चलते थे। पुनश्च अनेक प्रतिभाशाली अन्तेवासी वहीं रहकर शिक्षक का काम करने लगते थे।
‘कृण्वन्तो विश्वमार्यम्’ (अर्थात् ‘इस विश्व को आर्य-भाव की मानव-स्थली बनाओ।’) ‘शिक्षा जीवन जीने और वर्तमान जीवन तथा जीवन के पश्चात् के समय को समझने की तैयारी है ..... शिक्षा राजनैतिक एवं सामाजिक आवश्यकता है ...... विजय प्राप्ति, शांति का संरक्षण, उन्नत्ति की प्राप्ति, सभ्यता का निर्माण और इतिहास की रचना युद्धभूमि में नहीं वरन् शैक्षिक संस्थानों, संस्कृति के उपजाऊ स्थलों में ही की जा सकती है। अतः शिक्षा को प्रज्ञा प्रदायी के रूप में स्वीकार किया जाता है।’
राष्ट्रीय शिक्षा नीति में इस तथ्य का विशेष उल्लेख किया गया है कि प्रारंभिक बाल्यावस्था देखभाल और शिक्षा के पाठ्यक्रम और शिक्षण-विधि का उत्तरदायित्व सीधे मानव संसाधन विकास मंत्रालय का होगा ताकि प्राथमिक विद्यालय के माध्यम से पूर्व-प्राथमिक विद्यालय तक इसकी निरंतरता सुनिश्चित की जा सके और शिक्षा के मूलभूत पहलुओं पर ध्यान केन्द्रित किया जा सके । प्रारंभिक बाल्यावस्था देख-भाल और शिक्षा हेतु पाठ्यक्रम के आयोजन एवं क्रियान्वयन हेतु दायित्व का निर्वहण मानव संसाधन विकास मंत्रालय के साथ महिला और बाल विकास स्वास्थ्य और परिवार कल्याण मंत्रालय और जन-जातीय कार्य मंत्रालय द्वारा संयुक्त रूप से किया जाएगा । प्रारंभिक बाल्यावस्था देखभाल और शिक्षा के सुचारु रूप से एकीकरण एवं सतत मार्ग-दर्शन के लिए एक विशेष संयुक्त कार्य बल का गठन किया जाना चाहिए ।