वैदिक जीवन-दृष्टि एवं समकालीन वैश्विक चुनौतियााँ

इक्कीसवीं सदी विज्ञान तकनीक और वैश्वीकरण की तीव्र प्रगति की साक्षी है। आधुनिक आविष्कारों और डिजिटल क्रांति ने मानव जीवन को सुविधाजनक तो बनाया है किंतु इसके साथ ही अनेक गम्भीर वैश्विक संकट भी उत्पन्न हुए हैं। पर्यावरणीय असंतुलन जलवायु परिवर्तन प्राकृतिक संसाधनों का अत्यधिक दोहन नैतिक मूल्यों का ह्रास मानसिक तनाव उपभोक्तावाद सामाजिक विघटन तथा बढ़ती हिंसा आज मानव सभ्यता के समक्ष प्रमुख चुनौतियाँ हैं। यह स्थिति स्पष्ट करती है कि केवल भौतिक उन्नति मानव जीवन को संतुलित शांत और सार्थक नहीं बना सकती।

पिछले 5000 वर्षों में भारतीय लिपियों का विकास दक्षिण भारत के विशेष परिप्रेक्ष्य में

भाषा यदि ध्वनि है तो लिपि उस ध्वनि का चिह्न है । लिपि का अध्ययन किसी भी राष्ट्र की सामाजिक सांस्कृतिक पृष्ठभूमि को समझने में सहायक होता है । भारतीय उपमहाद्वीप में लिपियों का विकास लगभग पाँच हजार वर्षों की ऐतिहासिक प्रक्रिया का परिणाम है । किंतु प्रश्न है कि क्या भारतीय उपमहाद्वीप में प्रचलित लिपियाँ विदेशी प्रभाव से उत्पन्न हुई है? क्या उत्तर और दक्षिण भारतीय लिपियाँ सर्वथा भिन्न है अथवा किसी एक लिपि से ही इनकी उत्पत्ति हुई है? मुख्यतः दक्षिण भारतीय लिपियों के विकास का क्या क्रम रहा है? इस शोध पत्र में सिंधु लिपि से लेकर आधुनिक भारतीय लिपियों तक के विकास का क्रमिक एवं विश्लेषणात्मक अध्ययन प्रस्तुत किया गया है । विशेष रूप से ब्राह्मी लिपि को केंद्र में रखते हुए दक्षिण भारतीय लिपियों - तमिल मलयालम कन्नड़ और तेलुगु के विकास का विस्तृत विवेचन किया गया है ।

राष्ट्रियशिक्षानीतिः – 2020 इत्यालोके मातृभाषाशिक्षणं वैश्विकभाषाकौशलञ्च

शोधलेखोऽयं ‘राष्ट्रियशिक्षानीतिः – 2020’ इत्यत्र अन्तर्निहित-भाषासम्बन्धिप्रावधानानां व्यापकं विश्लेषणं प्रस्तौति। अध्ययनमिदं नीतेः मूलभूतां संकल्पनाम् अर्थात् शिक्षणमाध्यमत्वेन मातृभाषायाः स्थानीयभाषायाः वा महत्त्वं बहुभाषावादस्य पोषणार्थं त्रिभाषासूत्रस्य परिस्थितिसापेक्षक्रियान्वयनम् एवञ्च एकविंशतिशताब्द्याः कौशलैः सह भाषिक-क्षमतानां समन्वयं गहनतया समीक्षते। नीति-प्रलेखानां सम्बद्ध-शोधलेखानां शैक्षिक-सांख्यिकीयतथ्यानां तथा च ‘स्थित्यध्ययनानाम्’ इत्येतेषां विश्लेषणद्वारेण शोधोऽयं मातृभाषाधारित-बहुभाषि-शिक्षायाः संज्ञानात्मक-शैक्षणिक-सामाजिक-सांस्कृतिक-आर्थिक-लाभानां रेखाङ्कनं करोति। शोधोऽयं शिक्षक-शिक्षायां परिष्कारं डिजिटल-संसाधनानां विकासं तथा च शिक्षण-सामग्रीणाम् अनुवाद-सदृशीनां प्रमुखानां कार्यान्वयनस्य सन्दर्भे आह्वानानां परिचयं प्रददाति तन्निराकरणार्थम् एकस्य एकीकृत-तन्त्रस्य प्रस्तावं च करोति। निष्कर्षानुसारं राष्ट्रियशिक्षानीतिः 2020 इत्यस्याः दृष्टिकोणम् अनुपाल्यते तर्हि एषा समावेशेन सह न्यायसंगत-गुणवत्तापूर्ण-शिक्षायाः मार्गं प्रशस्तं करिष्यति । भारतम् अपि ‘वैश्विक-ज्ञान-महाशक्तिः’ इति रूपेण स्थापयितुं साहाय्यं करिष्यति । भाषावैविध्यम् काचित् अमूल्या सम्पत्तिः अस्ति न तु बाधा।

Language as Algorithm and Medium A Study of Ancient Indian Epistemology

This research paper investigates the dual role of language in the ancient Indian intellectual tradition as a subject of rigorous formalization and as the primary vehicle for scientific and philosophical discourse. By analyzing the algorithmic structure of Pāṇini’s Ashtādhyāyi and the prosodic foundations of Piṅgala’s Chandaḥśāstra this study demonstrates how the education of language reached a level of computational precision that anticipated modern formal language theory. Simultaneously it explores language in education by examining how Saṃskṛta served as the universal medium for advanced astronomy in the Āryabhaṭīya surgical procedures in the Suśruta Saṃhitā and complex mathematical analysis in the Kerala School. The paper further discusses the pedagogical frameworks of Nālandā and Takṣaśilā where mnemonic oral traditions and rigorous logic-based debates created a unique epistemic environment. The findings suggest that the integration of linguistic mastery with scientific inquiry formed a sacred-scientific synthesis that remains a foundational pillar of Indian Knowledge Systems (IKS).

भारतीयचिन्तनपद्धतौ शास्त्रीयनृत्यस्य परिकल्पना

भारतीयललितकलास्वस्ति नृत्यकलायाः अतीव वैशिष्ट्यम् । क्रीडनीयकप्रकृतिविशिष्टस्य नाट्यस्य आनन्दजनकत्वं तु स्वतः सिद्धम् । भरतखण्डेऽस्मिन् नृत्यस्य नानाप्रकाराः देशभेदेन अवलोक्यन्ते । परन्तु सर्वेषामपि नृत्यप्रकाराणां मूलं भवति शास्त्रीयनृत्यम् यच्च नाट्यशास्त्रादिग्रन्थेषु विस्तृतरूपेण प्रतिपादितम् । तादृशस्य शास्त्रीयनृत्यस्य उगमः प्रवर्धनम् स्वरूपकथनञ्च विस्तरेणात्र लेखे प्रस्तुतम् ॥

Multilingual Mandates vs. Classroom Realities Evaluating Teacher Capacity for Mother-Tongue Instruction Under NEP 2020

India' s National Education Policy (NEP) 2020 outlines a visionary shift toward Mother-Tongue-Based Multilingual Education (MTB-MLE) mandating that foundational learning (up to Grade 5) be conducted in a child’s native or regional language. While the cognitive and pedagogical merits of this directive are well-supported by global linguistic research the operational success of such a massive systemic pivot rests almost entirely on the shoulders of frontline educators. This paper critically examines teacher readiness to navigate the multilingual expectations of the NEP 2020 framework. Through a mixed-methods investigation involving surveys of 500 primary educators and in-depth interviews with school administrators across five linguistically diverse Indian states this study identifies a profound disconnect between policy idealism and classroom praxis.

Implementation of Mother Tongue-Based Education in Foundational Stage under NEP 2020

The National Education Policy (NEP) 2020 represents a paradigm shift in India' s educational landscape by prioritizing mother tongue-based education (MTBE) in the Foundational Stage (ages 3-8 covering Balavatika/pre-school to Grade 2). This policy mandates the use of the child' s home language mother tongue local or regional language as the primary medium of instruction until at least Grade 5 and preferably up to Grade 8 to foster foundational literacy and numeracy (FLN). Grounded in extensive cognitive and linguistic research MTBE enhances comprehension cognitive development cultural identity and equitable learning outcomes particularly for multilingual and marginalized communities.

वैदिक साहित्य में शिक्षा का स्वरूप The Nature of Education in Vedic Literature

वैदिक साहित्य भारतीय ज्ञान परंपरा का मूल आधार है वैदिक वाङ्मय में “शिक्षा” शब्द ध्वनि उच्चारण स्वर छन्द आत्मानुशासन तथा ब्रह्मविद्या के समन्वित तत्त्व का द्योतक है । वैदिक संहिताओं ब्राह्मण ग्रन्थों आरण्यकों उपनिषदों तथा वेदाङ्ग-शिक्षा ग्रन्थों के आलोक में यह प्रतिपादित किया गया हैं कि शिक्षा का मूल उद्देश्य केवल ज्ञानार्जन नहीं हैं अपितु “श्रुति- परम्परा” की अक्षुण्णता व्यक्तित्व-निर्माण आत्मनुभूत षोडश संस्कार एवं ब्रह्म-साक्षात्कार है । वैदिक कालीन शिक्षा प्रणाली का उद्देश्य व्यक्ति के बौद्धिक नैतिक सामाजिक तथा आध्यात्मिक विकास को सुदृढ करना है । प्रस्तुत शोध पत्र के द्वारा वैदिक साहित्य में वर्णित शिक्षा की प्रकृति उद्देश्य पद्धति गुरु-शिष्य संबंध पाठ्यक्रम तथा सामाजिक महत्त्व का विश्लेषण किया गया है । प्रस्तुत अध्ययन से स्पष्ट होता है कि वैदिक शिक्षा प्रणाली वर्तमान के आधुनिक शिक्षण सिद्धांतों जैसे – समग्र शिक्षा नैतिक शिक्षा और अनुभव आधारित शिक्षा की आधारशिला रही है ।

वैदिक दृष्टि में भाषा का प्रतीकवाद (Symbolism of Language in Vedic Perspective)

प्रस्तुत शोध-पत्र में वैदिक परम्परा के अंतर्गत भाषा (वाक्) के प्रतीकात्मक स्वरूप का दार्शनिक एवं भाषावैज्ञानिक विश्लेषण प्रस्तुत किया गया है । वैदिक वाङ्मय में भाषा को संप्रेषण का माध्यम ही नहीं अपितु उसे ब्रह्म की अभिव्यक्ति तथा सृष्टि की आधारभूत शक्ति के रूप में स्वीकार किया गया है । प्रस्तुत अध्ययन में ऋग्वेद उपनिषद् तथा भर्तृहरि के स्फोट सिद्धान्त के आलोक में यह प्रतिपादित किया गया है कि भाषा का स्वरूप बहुस्तरीय चैतन्यमय तथा प्रतीकात्मक है । वैदिक वाङ्मय में वर्णित वाक् सूक्त द्वारा भाषा (वाक्) को दैवी चैतन्यमयी तथा सृष्टि-नियामक शक्ति के रूप में प्रतिष्ठित किया गया है । प्रस्तुत शोध-पत्र का उद्देश्य वैदिक दृष्टि में भाषा के प्रतीकात्मक स्वरूप का दार्शनिक भाषावैज्ञानिक एवं आध्यात्मिक विश्लेषण करना है । इस अध्ययन में ऋग्वेद उपनिषद् तथा भर्तृहरि कृत वाक्यपदीय के आधार पर यह सिद्ध किया गया है कि भाषा ‘शब्द-ब्रह्म’ के रूप में समस्त सृष्टि की अभिव्यक्ति का माध्यम है ।

“भाषा की शिक्षा' से ' शिक्षा की भाषा' संस्कृत वाङ्मय का संज्ञानात्मक परिप्रेक्ष्य”

मानव सभ्यता के इतिहास में भाषा केवल सामाजिक संव्यवहार का माध्यम नहीं रही है अपितु वह मानवीय चेतना के क्रमिक विकास ज्ञान के संचयन और तार्किक चिंतन की संवाहक रही है। शिक्षाशास्त्र और भाषाविज्ञान (Linguistics) के अंतर्संबंधों का सूक्ष्म विश्लेषण करने पर दो विशिष्ट आयाम उभरकर सम्मुख आते हैं - ' भाषा की शिक्षा' (Language as a Subject) तथा ' शिक्षा की भाषा' (Language as a Medium of Instruction)। ' भाषा की शिक्षा' का प्राथमिक सरोकार भाषा की आंतरिक संरचना ध्वन्यात्मक शुद्धता व्याकरणिक नियमों और साहित्यिक विधाओं के अवबोध से है। इसके विपरीत ' शिक्षा की भाषा' एक व्यापक और रूपांतरात्मक अवस्था है जहाँ भाषा स्वयं को केवल एक विषय तक सीमित न रखकर ज्ञान की अन्य अमूर्त एवं व्यावहारिक विधाओं - यथा गणित खगोलशास्त्र दर्शन चिकित्सा विज्ञान न्याय और प्रौद्योगिकी - की अभिव्यक्ति का सशक्त माध्यम बनती है।

From Nālandā to Neural Networks Rethinking Multilingual Cognition and Adaptive Learning through a Translanguaging Pedagogical Lens under NEP 2020

Cultivation of hybrid multilingual learning environments was the soul of ancient Nalanda Mahavihara and Takshashila. Then concepts like dialogic pedagogy multilayered linguistic exchange and holistic cognition were nonexistent theories. But the emerging hybrid AI architectures progressively mirror the same intellectual spirit. NEP 2020’s priority for mother-tongue instructions and AI-assisted educational reconfiguration display significant scope for strengthening and utilizing India’s underlying multilingual cognition. Although the persistent layers of digital divide social media and chatbot addiction stay counterproductive to the learning environments sovereign projects like Bhashini Anuvadini are creating new prospects for mono-English to multilingual regional transitions. By analyzing Cummins’ Common Underlying Proficiency (CUP) García’s Translanguaging and the Zone of Proximal Development (ZPD) this paper explores the potential for AI-assisted sustainable cognitive agility and polylingual knowledge transfer.

संस्कृतवाङ्मय में वर्णोच्चारण-विधि (संस्कृत भाषा-शिक्षण के विशेष परिप्रेक्ष्य में)

मनुष्य के विचारों और ज्ञान को शब्दरूप में व्यक्त करने वाली शक्ति को वाक्शक्ति कहा जाता है। वाक्शक्ति मानव की अमूल्य संपदा है। शुद्ध मधुर और हितकारी वाणी द्वारा सर्वत्र सम्मान की प्राप्ति होती है। वाणी के बिना ज्ञान का प्रवाह संभव नहीं है। भाषा वाणी का व्यवहारिक रूप है। मुख से उच्चरित वर्णों का समूह शब्द कहलाता है शब्दों का समूह वाक्य और वाक्यों का समूह भाषा कहलाती है। भाषा विचार-विनिमय का मुख्य साधन है। व्यक्तित्वविकास में भाषा-कौशल का अत्यंत महत्त्वपूर्ण स्थान है। स्पष्ट शुद्ध और प्रभावी उच्चारण व्यक्ति के उत्तम व्यक्तित्व का परिचायक है। यही कारण है कि प्राचीन व्याकरण एवं भाषाशास्त्रीय ग्रंथों में वर्णोच्चारण विधि का विशेष रुप से वर्णन किया गया है। भाषाशिक्षण की दृष्टि से वर्णोच्चारणशिक्षण अत्यन्त आवश्यक है। वर्णोच्चारण प्रक्रिया के विषय में संस्कृतवाङ्ग्मय में उदात्तवर्णन प्राप्त होता है। प्राचीन आचार्यों ने शुद्धोच्चारण क्षमता को अत्यन्त आवश्यक माना है। उत्तम उच्चारण क्षमता का विकास आवश्यक है । अतः संस्कृत वाङ्मय में उत्तम वाचक को अपने व्यक्तित्व में किन गुणों का विकास करना आवश्यक है इसका विस्तृत वर्णन प्राप्त होता है।

Artificial Intelligence Sanskrit and the Road Ahead

Sanskrit' s grammar is unusually rule-bound which has made it a recurring point of interest for computer scientists since at least the 1980s. This piece walks through where AI is already helping Sanskrit scholarship what a more mature version of that work might look like a decade from now and the smaller more speculative story of Sanskrit as an inspiration for programming languages themselves.

भौमोत्पातानाम् अभिज्ञाने संहिताशास्त्रस्य भूमिका

भौतिकवादस्य विकासवादस्य च सिद्धान्तानेव सर्वाग्रे संस्थाप्य तदनुसरणं कुर्वतः आधुनिकजगतः प्रकृतिविषयकस्नेहः अपगत एव इति प्रतीतिर्भवति। तस्मादेव अस्मत्परितः दृश्यमानानां तथाकथितविविधविकासकार्याणां परिणामतः नानाविधसौख्यप्राप्तिस्तु जायते किन्तु प्रकृतेः महान् अपघातः अनेन सम्भवति इत्यपि सर्वविदितमेव। किञ्च स्वीयनानाविधावश्यकतानां परिपूर्तये कियदपि दौष्ट्यमाचरितुं सिद्धः दृश्यते मानवः। प्रकृतिविषयकघोरापराधकारणात् स्वसौख्यसम्पादने च विधीयमानपापवशाच्च नानाविधाः समस्याः उद्भूयमानाः सन्ति। तद्यथा- वैयक्तिक-शारीरिक-पारिवारिक-आर्थिक-सामाजिक-भौगोलिकादयः।

Bharatiya Education Past  Present  And  Future

This research paper explores the evolution of the Bhartiya (Indian) education system tracing its journey from ancient times to the present day and examining its future trajectory. The study delves into the rich traditions of the Gurukul system the influence of colonial rule and the significant shifts in educational policies post-independence. It analyzes the current education landscape in India highlighting its strengths challenges and the role of technology and policy reforms in shaping the future. The paper also discusses the implications of the National Education Policy (NEP) 2020 and other ongoing initiatives aimed at creating an inclusive holistic and forward-looking education system. Through this comprehensive overview the paper aims to provide insights into the past present and future of Bhartiya education reflecting on how it can evolve to meet the demands of a rapidly changing global landscape while retaining its cultural heritage.

राष्ट्रियशिक्षानीति-परिप्रेक्ष्ये शिक्षकस्य भूमिका

शिक्षा मानवसभ्यतायाः आधारस्तम्भमिव तदैतिह्यं विकासयति। शिक्षा सा प्रक्रिया वर्तते येन मनुष्यः वास्तविकस्य यथार्थस्य च स्वरूपं जानाति। सैव आमृत्युपर्यन्तं मनुजेन सह काञ्चन आध्यात्मिकप्रक्रियामुपैति। जीवनं प्रति मनुष्यस्य व्यवहारविचारादिषु नैरन्तर्यपरिवर्तन-परिमार्जनसंशोधनानि एतयैव जायते। शिक्षा सा वर्तते येन संस्कृतिः सभ्यता एवं युगान्तरेषु संचालितज्ञानमेतेषां नवसन्ततिषु संप्रेषणं क्रियते। यथोक्तं आचार्यपादेन कौटिल्येनापि-

Re-envisioning the Teacher’s Role under the National Education Policy 2020 A Paradigmatic Shift

India’s National Education Policy 2020 (NEP 2020) emphasizes a shift from content-heavy instruction to holistic experiential and value-based learning rooted in India’s cultural heritage. Central to this transformation is the teacher — envisioned not merely as a content-deliverer but as a facilitator leader motivator mentor and nation-builder. This paper elaborates on the teacher’s evolving role under NEP 2020 through the lens of educational reforms and Indian philosophical thought particularly Indian Knowledge System. It asserts that NEP 2020 is deeply aligned with the ancient Indian conceptualization of the guru combining timeless wisdom with modern educational demands.

The Evolving Role of the Teacher in NEP 2020 An Architect of India' s Educational Transformation

The National Education Policy (NEP) 2020 heralds a transformative vision for Indian education positioning teachers not only as facilitators of learning but as the linchpin in reimagining the school ecosystem. This paper explores the evolving role of teachers under NEP 2020 grounded in the policy’s holistic multidisciplinary and child-centric philosophy. Drawing upon specific references from NEP chapters and sections it highlights the teacher’s role as an educator mentor community mobilizer and lifelong learner.

Role of a Teacher in the Context of the National Education Policy-2020

The National Education Policy (NEP) 2020 of India represents a revolutionary framework that fundamentally redefines the role of teachers in the educational ecosystem. This research paper examines the multifaceted responsibilities and expectations placed upon educators under this transformative policy. The study analyzes how NEP 2020 positions teachers as catalysts for holistic development emphasizing their role in fostering critical thinking creativity and 21st-century skills among students. Through comprehensive analysis of policy documents and contemporary research this paper identifies key areas of transformation including continuous professional development technology integration multilingual education and competency-based assessment. The findings reveal that teachers are expected to evolve from traditional knowledge transmitters to facilitators of experiential learning mentors and lifelong learners themselves.

The Role of the Teacher in the Context of the National Education Policy (NEP)

The core objective of the Indian education system is not merely knowledge acquisition but the holistic development of the student. The " National Education Policy 2020" (NEP 2020) is a comprehensive framework focused on quality education value-based approaches and skill development. This policy emphasizes mother tongue-based learning a multidisciplinary approach the use of technology and the incorporation of moral values. For the successful implementation of this policy the role of the teacher is central.

राष्ट्रियशिक्षानीति-परिप्रेक्ष्ये शिक्षकस्य भूमिका

व्यक्तित्वस्य विकासाय भाषाकौशलमावश्यकम् । उत्तमा स्पष्टा च भाषा उत्तमव्यक्तित्वस्य प्रतीका भवति । एवं सर्वं विचिन्त्येव राष्ट्रियशिक्षानीतौ 2020 भारतीयभाषाशिक्षणस्य महत्त्वं प्रतिपादितमस्ति ।अत एषा शिक्षानीति बहुभाषितायाः प्रोत्साहनाय त्रिभाषिकनियमस्य क्रियान्वयनाय बद्धपरिकरास्ति । भारतीयभाषाणां शिक्षणेषु संस्कृतभाषाशिक्षणं महत्त्वपूर्णम् । संस्कृतभाषाशिक्षणस्य विषयेऽपि राष्ट्रियशिक्षानीतौ प्रावधानानि सन्ति । राष्ट्रियशिक्षानीते अनेके सिद्धान्ता संस्कृतभाषाशिक्षणे एवं साहित्यशिक्षणे एव सम्मिलिता सन्ति । अत राष्ट्रियशिक्षानीतौ संस्कृतशिक्षणस्य स्थानविशेषम् ।

राष्ट्रशिक्षानीतेः सन्दर्भे शिक्षकस्य भूमिका

शिक्षा ज्ञानं कौशलं अनुभवं च प्राप्तुं प्रक्रिया अस्ति या व्यक्तिस्य समग्रविकासाय सहायकं भवति । शिक्षा राष्ट्रस्य मेरुदण्डः अस्ति। देशस्य विकासाय शिक्षायाः प्रगतिः अत्यावश्यकी अस्ति । राष्ट्रियशिक्षानीतिः देशस्य शिक्षाव्यवस्थायाः संरचनायाः क्रियाकलापस्य च मार्गदर्शनं कुर्वती योजना अस्ति । अर्थात् यस्य देशस्य शिक्षाव्यवस्था सर्वकारस्य निरीक्षणे चालिता भवति या देशस्य सर्वेषां नागरिकानां कृते समानावकाशान् सुनिश्चितं करोति। अस्य मुख्यं लक्ष्यं भवति यत् सर्वेषां छात्राणां कृते एकं निश्चितस्तरं यावत् गुणवत्तापूर्णशिक्षा सुनिश्चिता भवतु यत्र सर्वेषां जातिः धर्मः लिङ्गः च न कृत्वा शिक्षणस्य अवसरः प्राप्स्यति।

The Power of Parental Compassion Fostering Emotional Well-being Through Samanya- Vishesha Siddhanta

Since a child' s family is their main support system it has a big impact on their learning and how they interact with others. Understanding the role of parental compassion in shaping a child' s behavior through the lens of Samanya-Vishesha Siddhanta gives a fresh perspective on this ancient and widely applicable Ayurvedic concept. Applying this theory can help solve many modern problems. Parenting is a skill that many parents don' t realize is important. It requires a lot of attention and care and it directly affects a child' s feelings thoughts and actions as well as their overall growth and well-being. Poor parenting leads to problems like anxiety stress and other mental health issues. It also slows down a child' s development. In today' s world where parents often work long hours and have little time with their children kids might feel lonely and sad. This is a serious issue that needs more attention.

तैत्तिरीयोपनिषदि शिष्यशिक्षायामाचार्यस्यावदानम्-तदानीमिदानीं च

कृष्णयजुर्वेदीयस्य तैत्तिरीयारण्यकस्य सप्तमाष्टमनवमानां प्रपाठकानां नाम तैत्तिरीयोपनिषदिति कथ्यते। तत्र च सप्तमः प्रपाठकः शिक्षावल्ली अष्टमः प्रपाठकः ब्रह्मानन्दवल्ली नवमश्च प्रपाठको भृगुवल्लीत्यस्माभिर्ज्ञायत एव। अस्याञ्चोपनिषदि मानवजीवनभूतसाधनाब्रह्मजिज्ञासासज्ज्ञाननैतिकतागुरुशिष्यसम्बन्धादिविषयविवेचनौज्ज्वल्येन प्रकाशिता। विशेषेण शिक्षावल्ल्यां शिष्यशिक्षायामाचार्यस्यावदानमनवद्यरूपेण प्रकाशितम्। वर्तन्ते निर्मलब्रह्मविद्यानिरूपणचित्तैकाग्रतागुरुकृपादयः शिष्यसमीपेऽत्यन्तावश्यकाः। शिक्षावल्ल्यां विविधोपासनाः शिष्याचार्यसम्बन्धिशिष्टाचाराः निरूपिताः सन्ति।

आर्य शब्द का भाषाशास्त्रीय दार्शनिक एवं सांस्कृतिक अनुशीलन

यह शोध-पत्र ‘आर्य’ शब्द के भाषाशास्त्रीय दार्शनिक सांस्कृतिक तथा ऐतिहासिक विकास का वैदिक युग से लेकर आधुनिक संदर्भों तक विस्तृत अनुशीलन प्रस्तुत करता है। ‘आर्य’ शब्द की व्युत्पत्ति ‘ऋ गतौ’ धातु से मानी गई है जिसका मूल अर्थ गति प्रगति ज्ञान और उन्नति है। वैदिक साहित्य में यह शब्द जाति-निरपेक्ष गुणप्रधान आचरणाधारित और मानवतावादी अर्थ में प्रयुक्त हुआ है।

अभिज्ञानशाकुन्तलमधिकृत्यादर्शान्वेषणम्

कविकुलगुरुकालिदासविरचितं नाटकमभिज्ञानशाकुन्तलं न केवलं प्राच्यानामपितु पाश्चात्त्यानामपि विदुषां प्रेमास्पदं ग्रन्थरत्नमस्ति । विश्वसाहित्ये प्रसिद्धं नाटकमिदं समाजे सच्चारित्र्यं शिक्षयति । मानवनिवहानामादर्शञ्चोपदिशति । राज्ञा केन प्रकारेण भाव्यम् ? युवतीनां चरितं कीदृशमपेक्षितम् ? समाजे कथं वर्तितव्यम् ? इत्यादयः सर्वेऽपि विषया नाटककृता नाटके सन्निविष्टाः सन्ति । विषमपरिस्थितावपि सत्पुरुषाः स्वचारित्र्यं न दूषयन्ति धर्मस्य मर्यादाया आदर्शस्य नीतेश्च मार्गो दुष्करो भवति ।

बौद्धकालीन स्त्री शिक्षा की प्रासंगिकता

स्त्री किसी भी सभ्यता राष्ट्र एवं समाज की अनिवार्य सहगामिनी है। उसके अभाव में किसी भी सभ्यता का उद्भव संवर्धन तथा विकास सम्भव नहीं है। अतः शिक्षा दर्शन और संस्कृति के समग्र अध्ययन में समाज के इस अर्द्धांश की उपेक्षा कदापि उचित नहीं मानी जा सकती। ज्ञान-विज्ञान सभ्यता संस्कृति धर्म दर्शन तथा सामाजिक-नैतिक व्यवस्था के निर्माण में बौद्धकालीन अनेक विदुषियों का योगदान अत्यन्त महत्त्वपूर्ण रहा है। इसी क्रम में उस युग की स्त्री-शिक्षा व्यवस्था का विशद अवलोकन आवश्यक प्रतीत होता है।

Living the Vision of NEP 2020 Multilingualism Cultural Diversity and Multidisciplinary Learning in Indian Classrooms

The National Education Policy 2020 (NEP 2020) serves as a blueprint for a transformative educational journey moving India from a " factory-model" of schooling to a " holistic-learning" ecosystem. This research explores the triad of Multilingualism Cultural Diversity and Multidisciplinary Learning as the primary drivers of this change. By synthesizing current pedagogical theories with practical classroom interventions this paper provides a roadmap for educators and policymakers. It highlights how linguistic flexibility the integration of Indian Knowledge Systems (IKS) and the removal of rigid disciplinary silos can enhance cognitive development and social cohesion.

भारतीय शिक्षा व्यवस्था में राष्ट्रीय शिक्षा नीति–2020 एक मानववैज्ञानिक एवं समालोचनात्मक विश्लेषण

राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 (National Education Policy 2020) स्वतंत्र भारत की तीसरी शिक्षा नीति है जिसे लगभग 34 वर्षों के लंबे अंतराल के बाद लागू किया गया है। यह नीति भारतीय शिक्षा-व्यवस्था को 21वीं सदी की सामाजिक आर्थिक और तकनीकी आवश्यकताओं के अनुरूप पुनर्गठित करने का एक व्यापक प्रयास है। राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 का प्रमुख उद्देश्य शिक्षा को अधिक समावेशी समानतापूर्ण लचीला बहुविषयक कौशल-आधारित और रोजगारोन्मुख बनाना है। प्रस्तुत शोध-पत्र का उद्देश्य राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 के प्रमुख प्रावधानों का गहन विश्लेषण करना तथा यह मूल्यांकन करना है कि यह नीति भारतीय समाज में विद्यमान सामाजिक असमानताओं

ईसीसीई के सन्दर्भ में प्राचीन भारतीय दृष्टिकोण और राष्ट्रीय शिक्षा नीति (NEP 2020)

राष्ट्रीय शिक्षा नीति २०२० प्रथम खंड के प्रथम अध्याय में प्रारम्भिक बाल्यावस्था में देखभाल एवं शिक्षा (ECCE) की बात करती है। प्रारम्भिक बाल्यावस्था में देखभाल और शिक्षा (ECCE) कोई नविन पद्धति नहीं है जो शिक्षा नीति द्वारा बनाई गई हो अपितु प्राचीन काल से भारतीय परम्परा में चलती आ रही शिशुओं की लालन-पोषण से संबद्ध चर्चा है जो कि शिक्षा से विस्मृत हो गई थी। राष्ट्रीय शिक्षा नीति २०२० शिक्षा का प्रारम्भ नर्सरी कक्षा से करती है। यह नीति प्राथमिक एवं माध्यमिक शिक्षा व्यवस्था (१०+२) को बदलकर प्रारंभिक प्राथमिक माध्यमिक एवं उच्च माध्यमिक (५+३+३+४) में शिक्षा व्यवस्था को विभाजित करती है। इस पद्धति में प्रथम कक्षा से पूर्व नर्सरी एवं प्रारंभिक शिक्षा से सम्बंधित अन्य दो वर्गों को शिक्षण पद्धति में जोड़ा गया है।

ENVIRONMENTAL VALUES IN CLASSICAL SANSKRIT TRADITION

Sanskrit literature presents a profound and holistic vision of environmental ethics rooted in the moral spiritual and philosophical worldview of ancient India. This study explores the rich eco-ethical consciousness embedded in Vedic Epic Puranic Dharmashastra and classical Sanskrit literary texts. This vision revolves on cosmic interdependence viewing humans animals plants and nature as essential parts of a unified moral system. Concepts such as Vasudhaiva-kutumbakam ahiṃsā (non-violence) ānṛśaṃsya (compassion) yajña (sacrifice as mutual sustenance) and self-restraint shape an ethical framework that promotes harmony between humanity and nature. Texts like the Ṛgveda Mahābhārata Rāmāyaṇa Bhagavadgītā Manusmṛti Arthaśāstra Pañcatantra and works of Kālidāsa and Bāṇabhaṭṭa articulate respect for forests animals and all forms of life emphasizing protection moderation and gratitude.

The Yogic Spirit of the Sundarakāṇḍa of Vālmīki Rāmāyaṇa

The Sundarakāṇḍa of the Vālmīki Rāmāyaṇa is renowned not only for its poetic grandeur and narrative brilliance but also for its profound philosophical and spiritual undercurrents. Among all the kāṇḍas it uniquely serves as a concentrated exposition of yogic ideals and inner transformation. This study explores how Sundarakāṇḍa represents the essence of Yoga - not just as a philosophical doctrine but as a lived spiritual journey. Drawing parallels from the Bhagavad Bhagavatgītā Pātañjala Yoga Sūtras and traditional Bhakti texts this article interprets Hanumān’s odyssey as a yogic pilgrimage reflecting central concepts like tapas dhyāna vairāgya śraddhā and bhakti. Through symbolic analysis scriptural parallels and philosophical interpretation the paper positions Sundarakāṇḍa as a rich manual for the spiritual aspirant.

AN ANALYTICAL EXPLORATION OF THE INTERRELATIONSHIP BETWEEN TRIVARGA AND MOKSHA A STUDY BASED ON THE CHARAKA SAMHITA

Ayurveda the science of healthy life and well-being also deals with the concepts of Trivarga and Moksha. Documentation of these concepts could be seen in the Charaka Samhita. Charaka Samhita deals with the defined understanding of Trivarga that includes Dharma Artha and Kama and the methods of achieving Moksha. The role of Trivarga in the achievement of Moksha. Dharma Artha and Kama pave the way for Tattwasmriti which helps in depletion of the balwat-karmas of an individual breaking the cycle of punarjanma and hence achieving the eternal bliss and truth called Brahm termed as Moksha or Pushkalam i.e. the most copious form of the Trivarga. Ayurveda as a moksha-nimitta shastra helps individuals to detach themselves from the clutches of the materialistic world and vishyopabhoga and communicate with the Thee

न्यायामृतस्थदृश्यत्वहेतुभङ्गस्य न्यायामृतरसकुलङ्कषरीत्या विमर्शः

भारतीयदार्शनिकसाहित्ये अधिकरण-प्रकरण-वादरूपेण भेदः समुपलभ्ये। तत्र अधिकरणं नाम ᳚वेदान्तविचारात्मकः न्याय ग्रन्थः१ ᳚ इति । अर्थात् यस्मिन् ग्रन्थभागे युक्तीनामुपयोगेन वेदान्तविचारः प्रवर्तते तस्य अधिकरणमिति संज्ञा भवति। उदाहरणार्थम् - ब्रह्मसूत्रेषु अधिकरणव्यवहारः । एवं प्रकरणं नाम ᳚ शास्त्रैकदेशसंबद्धं शास्त्रकार्यान्तरे स्थितम्२ ᳚। उदाहरणार्थम् - द्वैतवेदान्ते दशप्रकरणानि एवमद्वैतवेदान्ते वेदान्तपरिभाषा-वेदान्तसारः न्यायशास्त्रे तर्कसंग्रहःन्यायसिद्धान्तमुक्तावलीत्यादि। अत्र सर्वत्र तत्तत् शास्त्रसम्बद्धसिद्धान्तानां प्रतिपादनं भवति। इदानीम् वादः नाम ᳚᳚तत्वनिर्णयफलः कथाविशेषः३ इति। स्वसिद्धान्तप्रतिपादित तत्वानां स्थापनाय कथारूपेण {पक्षप्रतिपक्षरूपेण} यः ग्रन्थभागः प्रचलति तस्य वादशब्देन व्यवहारः। उदाहरणार्थम् - श्रीहर्षस्य खण्डनखण्डखाद्यम् व्यासतीर्थानां न्यायमृतम् गदाधरस्य शक्तिवादः इत्यादि। पूर्वोक्तेषु ग्रन्थेषु ग्रन्थकाराः स्वस्वसिद्धान्तप्रतिपादित तत्वानां कथामुखेन स्थापितवन्तः। न्यायमृते उत्तरमीमांसातत्वानां पूर्वमीमांसायुक्तीनामुपयोगेन स्थापितवन्तः। उत्तरमीमांसेऽपि जगतः स्वरूपविषयकचर्चा द्वैताद्वैतनये दरीदृश्यते॥

Girls’ Education in the Indian Knowledge System A Historical and Philosophical Overview

Girl education in India has deep roots in the Indian Knowledge System (IKS) particularly during the Vedic and early classical periods. Contrary to colonial narratives that portray ancient Indian society as regressive early texts such as the Rigveda Upanishads and Smritis reveal that women actively participated in scholarly and philosophical life. Eminent female figures like Gargi and Maitreyi engaged in intellectual debates and authored spiritual hymns while educational initiation rituals (upanayana) were available to girls in learned families. Institutions such as forest universities and temple schools provided access to holistic education including philosophy arts and sciences. However from around 300 BCE patriarchal norms encoded in legal texts like Manu Smriti led to a gradual decline in women’s educational rights. Foreign invasions and colonial policies further disrupted inclusive learning systems. Despite this epigraphic evidence from early medieval India shows women’s continued engagement in religious and administrative roles implying sustained literacy. This paper traces the historical trajectory of girl education in India examining its philosophical foundations decline and revival. It calls for a re-engagement with India’s indigenous educational values to inform modern gender-equitable learning practices.

Mudra Play Hand Gestures as Learning Tools for Young Children

This article explores the innovative integration of mudras (traditional Indian hand gestures) into early childhood education as effective learning tools. Drawing from ancient Indian knowledge systems Mudra-Play represents a novel pedagogical approach that combines physical movement cognitive development and cultural preservation in early childhood care and education (ECCE). The research examines how systematic use of hand gestures can enhance memory retention improve fine motor skills support language development and facilitate holistic learning experiences for children aged 3-6 years. Through analysis of neurological foundations developmental benefits and practical implementation strategies this study demonstrates that mudra-based learning activities can significantly contribute to children' s cognitive emotional and social development while preserving cultural heritage. The integration of traditional wisdom with contemporary educational practices offers a unique framework for developing culturally responsive and developmentally appropriate curricula that honour India' s rich pedagogical traditions while meeting modern learning objectives.

शब्दशक्तिविमर्शः

“अस्मात्पदात् अयमर्थो बोद्धव्य इति ईश्वरसंकेतः शक्तिः”इतिपरिभाषया परिगृहीता निखिलमपि वाङ्मयमभिव्याप्य वर्तमाना शब्दशक्तिरालेखेऽस्मिन् चर्चिता विमर्शिता च । सर्वैः शब्दार्थतत्त्वविद्भिराचार्यैः प्रायः शब्दनिष्ठा त्रिविधा वृत्तिर्वर्णिता विवृता च । कैश्चित्तात्पर्यार्थोऽपि स्वीकृत इति चत्वारोऽर्थाः प्रसिद्धाः । अभिधा-लक्षणा-व्यञ्जनाख्येषु तिसृषु वृत्तिषु अभिधावृत्तेः मुख्यत्वं स्वीकृतम् । अभिधावृत्तिः अभिधाशब्दशक्तिर्वा शब्दस्य प्रथमा शक्तिरस्ति । कमपि शब्दमर्थयितुं प्रथममभिधाख्या शब्दशक्तिर्यतते । तस्मिन् क्षणे पुनः लक्षणा प्रवर्तते । तस्यां चासमर्थायां व्यञ्जना संयुज्यत इति तिसृणामेव शब्दशक्तीनां विनियोगो वाङ्मये बोभवीति । तत्र चाभिधाशब्दशक्तिः सर्वत्र नोपयातीति लक्षणाशब्दशक्तिः साहित्यिकैः स्वीकृता तथा व्यञ्जना चाङ्गीकृता । प्रायः आलेखेऽस्मिन् एत एव विषयाः प्रतिपादिताः यथायथं विवेचिताश्च । पूर्वाचार्याणां मतान्याश्रित्य विहितमिदमध्ययनं शब्दशक्तिविविदिषूणामध्येतॄणामन्येषामप्युपकारकं सिद्ध्येत् ।

Mūtravimocana Sūktam of Atharvaveda – A Study of Obstructive Uropathy in Atharvaveda

This study examines the Mūtravimocana Sūktam of the Atharvaveda which addresses obstructive uropathy—a condition characterized by partial or complete urinary blockage. The Atharvaveda offers a unique integration of mantra-based healing and therapeutic interventions invoking divine forces such as Parjanya Mitra Varuṇa Candra and Sūrya to facilitate urinary relief. In Āyurveda obstructive uropathy is classified under Prameha and is specifically described in texts like Aṣṭāṅgahṛdaya and Suśruta Saṃhitā as Mutrāghāta and Mutrakṛcchra with variations based on Doṣa imbalances. Ayurvedic literature details conditions like Aśmarī (kidney stones) Mutradhārasaṅga (urinary blockage) and other classifications that align with modern medical understandings. Therapeutic prescriptions in Atharvaveda include herbal treatments and surgical approaches. The Sāyaṇa Bhāṣyam explains the use of medicinal plants such as Harītakī Mūṣikā and Śara which exhibit diuretic properties. Surgical instruments like Loha Śalākā are recommended for clearing urinary obstructions. Ayurvedic texts provide further insight into the use of Śalākā Yantra which includes specialized tubular instruments for urinary surgery. The study highlights the interdisciplinary relevance of Vedic texts in medical science particularly in understanding ritualistic healing alongside practical interventions. It explores how mantra recitation coupled with pharmacological and surgical approaches plays a significant role in treating obstructive uropathy. By contextualizing the Mūtravimocana Sūktam within an Ayurvedic and biomedical framework this research demonstrates the enduring relevance of ancient wisdom in modern healthcare offering insights into holistic treatment methodologies that blend traditional and contemporary medical practices.

भारतीय ज्ञान परम्परा में वेदों में निहित आयुर्वेद विज्ञान

भारतीय ज्ञान परंपरा भारतीय सभ्यता की नींव है जो हज़ारों वर्षों से विकसित हो रही है । यह परंपरा न केवल भारत बल्कि पूरी दुनिया के सांस्कृतिक बौद्धिक और आध्यात्मिक जीवन में प्रभावी रही है । भारतीय ज्ञान परंपरा में दर्शन गणित चिकित्सा विज्ञान साहित्य कला आयुर्वेद और योग का समावेश है । उसमें भी आयुर्वेद जीवन का मुख्यतम अंग है । जन्म से लेकर मृत्यु तक आयुर्वेद की आवश्यकता होती है । स्वस्थ रहने की पद्धति का उपदेष्टा आयुर्वेद है । आयुर्वेद एक प्राचीन चिकित्सा पद्धति है जो शरीर मन और आत्मा के सामंजस्य पर आधारित है । इसमें त्रिदोष सिद्धांत (वात पित्त कफ) का महत्व है जो शरीर की सेहत को बनाए रखने के लिए संतुलन की आवश्यकता को दर्शाता है ।

राजेन्द्रकर्णपूरकाव्ये गुणविचारः – एकं समीक्षात्मकम् अध्ययनम्

अयं लेखः संस्कृतसाहित्ये काव्यगुणस्य महत्त्वं राजेन्द्रकर्णपूरकाव्यस्य दृष्टान्तसहयोगेन व्याख्यायते। काव्ये गुणाः श्लेषः प्रसादः समता माधुर्यं सुकुमारता अर्थव्यक्तिः उदारता ओजः कान्तिः समाधिः इत्यादयः दश मुखरूपेण सर्वैः स्वीक्रियते। दण्डीवामन-मम्मटादयः आचार्याः गुणानां विभिन्नविचारं प्रस्तुतवन्तः। दण्डिनः मते गुणाणां संख्या दश वामनस्य मते विंशतिः मम्मटस्य मते त्रयः गुणाः। प्रत्येकः गुणः काव्ये न केवलम् आवश्यकम् अपि तु अत्यन्तः प्रभावशाली इति दर्शितम्। अस्मिन् लेखे " राजेन्द्रकर्णपूरकाव्ये" प्रयुक्तानां गुणानां विश्लेषणं कृतं यत्र कविना गुणप्रयोगे विशेषकौशलं प्रदर्शितम्। शोधपत्रेण संस्कृतकाव्ये गुणविचारस्य महत्त्वं सरलतया विवेचितम्।

The Lingering Effect of Colonial Trauma in Indian Food Habits A Chronological Reflection

A highly (web) circulated speech excerpt from Lord Macaulay in 1835 stated that the high cultural and spiritual backbone of India should be broken by establishing the Anglo knowledge base and dismissing the existing Indian knowledge base . Although “Macaulay' s Minute on Education” does not explicitly state the exact words it reflects a negative attitude towards Sanskrit and other native languages in accessing existing knowledge bases2. Modern India with its “Atma Nirbhar Bharat” concepts and reformed knowledge bases has recovered from the colonial effect to some extent. However the neo-colonial components including trade and foreign investment pressures technological dependence the carbon market and consumer culture are highly concerning emerging threats. Contextually colonial trauma still lingers in the negative attitude towards traditional foods like millet and preference for Western breakfast and dinner etiquette. Neo-colonial market’s attention towards this opportunistic attitude reflects in intensified application of frozen and other harmful Western food models. Promoting the traditional nutritional knowledge base including Ayurveda not only induces generational trauma-informed care but can reduce the concerning rate of food habits and lifestyle diseases.

Exploring new frontiers in AI based OCR techniques for script processing

Optical Character Recognition (OCR) enables digitization of text to a machine-readable text format wherein the text can be handwritten characters images or in printed format. With the emergence of Artificial Intelligence (AI)-Machine Learning (ML) OCR has moved from a simple text-recognition tool to a smart text understanding system that can extract interpret and automate decision making from any type of document. This study explores new frontiers in the OCR technology that has been enabled by the advent of AI/ML by understanding the innovative landscape. The analysis highlights key innovative tools/platforms available across the globe along with details of tools/platforms made in India. Further the patenting trends are examined to gain insights on emerging technologies the key players enabling the technologies and filings across the globe.

Influence of Kautiliya Arthaśāstra in shaping India' s Foreign Policy in Modi Era

Kautilya Arthaśāstra has immensely contributed in shaping foreign policies in independent India. The period beginning 2014 has marked a new era in India’s transformative and assertive foreign policy paradigm under Prime Minister Modi. The horizon of India’s relation with other nations has transformed within the principle of multipolarity. The recent approach in foreign policy dimension has focused of ‘India First’ principle to sustain and stabilise regional security concerns.

रघुवंशे निर्दिष्टानां कतिपयवृक्षाणामायुश्शास्त्रदिशा पर्यालोचनम्

विदितमेव सर्वेषां सहृदयहृदयानां काव्यरसास्वादिनां यत्कालिदासस्य रचनायाः महत्त्वपरिगणनं किञ्चिद्दुष्टकरमेव। यतः संस्कृतवाङ्मये काव्यक्षेत्रे च कवेरस्य बह्व्यः रचनाः समुपलभ्यन्ते। एवं प्रसिद्धासु कृतिषु कुमारसंभवं रघुवंशञ्च महाकाव्यक्षेत्रे शाकुन्तलं मालविकाग्निमित्रञ्च नाटकक्षेत्रे प्रसिद्धत्वं भजन्ते। तत्र रघुवंशमहाकाव्यं कवेरस्य विद्वत्तायाः निपुणतायाश्च पराकाष्ठां प्रदर्शयति। एकोनविंशतिसर्गात्मके काव्येऽस्मिन् न केवलं भगवतः श्रीरामचन्द्रस्य अपि तु संपूर्णस्य रघुवंशस्य राज्ञां चरितमपि प्रतिपादितं दृश्यते। महाकवेरस्य आलङ्कारिकवैदुष्यं तत्र दृश्यते यत्रानेन महाकाव्यांशैः सह तात्कालिकसामाजिकविषया अपि प्रतिपादिताः। तद्रीत्या पर्यालोच्यमाने इतिहासप्रतिपादनपरेऽस्मिन् महाकाव्ये केचन वैद्यविषयसङ्केता अपि द्रष्टुं शक्याः। महाकविना तत्र तत्र श्लोकेषु आयुश्शास्त्रे प्रतिपादितानां वृक्षाणां द्रव्याणां वा नामानि निर्दिष्टानि। तं सन्दर्भं किञ्चित्सूक्ष्मेक्षिकदृष्ट्या आलोचयामो यदि तर्हि न केवलं महाकवेरस्य काव्यनैपुण्यमपि तु सर्वशास्त्रनैपुण्यं ज्ञातुं शक्यते। पत्रेऽस्मिन् तानि पद्यानि स्वीकृत्य तत्र निर्दिष्टानां वृक्षाणामायुश्शास्त्रदिशा किं प्रयोजनम् अस्य निर्देशोऽत्र काव्ये किमर्थं कथञ्च महाकविना कृतः इत्येतत् सर्वं सप्रमाणं निरूप्यते।।

Integrating Tradition and Sustainability Building Materials in Vāstuśāstra

Vāstuśāstra the traditional Indian science of architecture provides a comprehensive framework for designing structures that harmonize with nature and promote well-being. This research paper delves into the traditional and eco-friendly building materials prescribed in Vāstuśāstra emphasizing their relevance in modern sustainable construction practices. Materials such as clay wood stone lime and natural fibres are examined for their ecological benefits cultural significance and alignment with sustainable development goals. The research paper highlights the energy efficiency durability and low environmental impact of these materials advocating for their integration into contemporary architectural practices.

छान्दोग्योपनिषदि प्रतिपादिता शिक्षणपद्धतिः

भरतीयज्ञानपरम्परायाम् उपनिषदः अत्यन्तं विशिष्टस्थानं भजन्ते। यत्र आत्मज्ञानं ब्रह्मतत्त्वं मोक्षरहस्यञ्च साङ्केतिकतया दृष्टान्तात्मकरूपेण संलापप्रधानपद्धतिद्वारा च प्रकटीभवन्ति । एतासु उपनिषत्सु छान्दोग्योपनिषत् एका मुख्या उपनिषद्। या च सामवेदीयताण्डयशाखायाः छान्दोग्यब्राह्मणस्याङ्गभूता। " छान्दोग" शब्दस्यार्थस्तावत्

बाल विकास में भारतीय ज्ञान प्रणालियों (आईकेएस) का योगदान एक समग्र दृष्टिकोण

यह अध्ययन भारतीय ज्ञान प्रणालियों के माध्यम से संज्ञानात्मक भाषायी भावनात्मक और सामाजिक विकास के संवर्धन के विभिन्न माध्यमों का अन्वेषण करता है। संस्कृत भाषा कथावाचन और आयुर्वेद जैसी प्राचीन भारतीय प्रथाओं को आधुनिक शिक्षा के संदर्भ में प्रस्तुत किया गया है। अध्ययन से स्पष्ट है कि ये प्रणालियाँ बच्चों के समग्र विकास की वृद्धि में महत्वपूर्ण भूमिका का निर्वहन करती हैं और आधुनिक शिक्षण पद्धतियों के लिए मूल्यवान अंतर्दृष्टि प्रदान करती हैं। संस्कृत भाषा अपने सटीक व्याकरण और संरचना के कारण संज्ञानात्मक क्षमता की वृद्धि करती है जबकि प्राचीन भारतीय शिक्षा प्रणाली में बहुभाषावाद बच्चों के सामाजिक और मानसिक लचीलेपन को प्रोत्साहित करती है। कथावाचन के माध्यम से भावनात्मक और नैतिक विकास को बढ़ावा मिलता है। पञ्चकोषीय अवधारणा के माध्यम से ECCE में शारीरिक मानसिक और आध्यात्मिक विकास का समग्र दृष्टिकोण अपनाया जाता है। उत्सवों और अनुष्ठानों के माध्यम से भावनात्मक और सामाजिक विकास को भी सुदृढ़ किया जाता है जो सर्वांगीण विकास में सहायक है।

NEP 2020 Revolutionizing Early Childhood Education in India

Early Childhood Care and Education (ECCE) plays a fundamental role in shaping a child’s cognitive social physical and emotional development. Recognizing its importance the National Education Policy (NEP) 2020 has introduced several transformative initiatives to strengthen ECCE in the country. For the first time in the educational history of our country a policy emphasizes universal access to quality early childhood education. It integrates ECCE into the formal education framework through a structured 5+3+3+4 school education. It envisions strengthening Anganwadi centers and creating Ashramshalas in tribal regions enhancing teacher training focusing on activity-centered learning to foster holistic child development. This essay examines the provisions of NEP 2020 on ECCE vis-à-vis its embedding in the Indian cultural traditions and practices. Our country’s philosophical and cultural practices have always emphasized holistic child development encompassing moral spiritual emotional alongside cognitive and physical. A strong foundation in early education is essential for lifelong learning and NEP 2020 marks a significant step toward revolutionizing early childhood education in India.

प्रारम्भिकबाल्यावस्थापालने शिक्षायां च मातुः भूमिका

गर्भावस्थायां षष्ठे सप्तमे मासे बालकः भाषागतभेदान् अपि जानाति । अतः गर्भस्थशिशुना सह मात्रा कृतः संवादः बहु प्रभावं जनयति । मातृभाषायाः व्याख्या अपि अनया क्रियया एव परिकल्पिता अस्ति । अर्थात् गर्भस्थशिशुना सह माता यया भाषया भाषते सा तस्य मातृभाषा इति उच्यते । यद्यपि अस्याम् अवस्थायां बालकः कुटुम्बजनेभ्यः परिजनेभ्यः विभिन्नप्रसङ्गेभ्यः च अधिगन्तुं प्रयतते तथापि तस्य तत् अवगमनं मात्राङ्काधारितम् एव भवति । अर्थात् मात्रा सह तस्य कालः आधिक्येन गच्छति । अतः यथा मातुः शिक्षा तथा तस्य चरित्रनिर्माणं भवति । क्वचित् अपवादभूतानि अपि उदाहरणानि सन्ति यत्र सुमातुः पुत्रः दुर्जनः कुमातुः पुत्रः सज्जनः अपि दृश्यते ।

भारतीय-ज्ञानपरम्परायां बाल्यावस्था-संरक्षणं शिक्षणं च

बाल्यावस्थायां शिशोः सर्वतोमुखाभिवृद्ध्यर्थं शैशवकालीनं शिक्षणं परिचर्या च महत्वपूर्णं स्थानं निर्वहति । वेद-उपनिषत्-शास्त्रेषु स्मृतिषु च मूलभूताः भारतीयज्ञानव्यवस्थाः बाल्यकालस्य संरक्षण-विषये गहनम् अन्वेषणं प्रददति । भारतीयदृष्टिकोणे बालस्य शारीरिकं मानसिकं बौद्धिकं आध्यात्मिकं च वृद्धिः समग्रविकासे बलं प्रदीयते । अस्मिन् पत्रे अस्माकं प्राचीनशास्त्रेषु आयुर्वेद-मनुस्मृति-उपनिषत्सुभाषितेषु बालस्य परिचर्या मातापितृत्वं शिक्षणसम्बद्धाः पद्धतयः मूल्यानि व्यवहाराः च अन्वेषिताः सन्ति ।

भारतीयज्ञानपरम्परायां प्रारम्भिक-बाल्यावस्थासंरक्षणं

“शैशवे अभ्यस्तविद्यानां यौवने विषयैषिणाम्” इति कविकुलगुरोः कालिदासस्य वचनं बाल्ये एव विद्याधनत्वं सत्यापयति । अत्रापि बोधनप्रकाराणां दर्शनशास्त्रपरम्परायां महत्वम् प्रतिपादितम् । एवं प्राचीनप्रबोधनविधिना माणवकः सुसंस्कारसम्पन्नो भवति । अनेन प्रज्ञानेत्रो लोकः प्रज्ञा प्रतिष्ठिता भवति इति ऐतरेयोपनिषदुक्तप्रकारेण तद्धितपःतद्दितपः सिद्ध्यति ।

Impact of Parental Lifestyle on Early Childhood in Modern Indian Social Setting A Qualitative Study

Researchers confirm that 80% of brain development is completed by the age of 8 . During these early childhood years parents become the primary role models. Both parental lifestyle and parenting style have a major impact on the growth and development of children. However India still lacks a diversified simulation environment trained teachers and parent participation scope for the early childhood years. Although parental awareness has increased a lot about individualist child-centric needs parents are still in darkness about the effect of parental lifestyle. Under-investment in this topic can provide a younger generation of obese codependent anxious and overly obedient people. Generation Alpha has a huge scope for socioeconomic contribution and Millennial/generation Z parents should not miss that chance.

राष्ट्रीय शिक्षा-नीति २०२० के परिप्रेक्ष्य में शिशु, शिक्षा एवं शिशु-शिक्षा

राष्ट्रीय शिक्षा नीति में इस तथ्य का विशेष उल्लेख किया गया है कि प्रारंभिक बाल्यावस्था देखभाल और शिक्षा के पाठ्यक्रम और शिक्षण-विधि का उत्तरदायित्व सीधे मानव संसाधन विकास मंत्रालय का होगा ताकि प्राथमिक विद्यालय के माध्यम से पूर्व-प्राथमिक विद्यालय तक इसकी निरंतरता सुनिश्चित की जा सके और शिक्षा के मूलभूत पहलुओं पर ध्यान केन्द्रित किया जा सके । प्रारंभिक बाल्यावस्था देख-भाल और शिक्षा हेतु पाठ्यक्रम के आयोजन एवं क्रियान्वयन हेतु दायित्व का निर्वहण मानव संसाधन विकास मंत्रालय के साथ महिला और बाल विकास स्वास्थ्य और परिवार कल्याण मंत्रालय और जन-जातीय कार्य मंत्रालय द्वारा संयुक्त रूप से किया जाएगा । प्रारंभिक बाल्यावस्था देखभाल और शिक्षा के सुचारु रूप से एकीकरण एवं सतत मार्ग-दर्शन के लिए एक विशेष संयुक्त कार्य बल का गठन किया जाना चाहिए ।

भारतीय ज्ञान प्रणालियों (IKS) के संदर्भ में प्रारम्भिक बाल्यावस्था देखभाल और शिक्षा (ECCE)

यह अध्ययन भारतीय ज्ञान प्रणालियों (आईकेएस) में प्रारंभिक बाल्यावस्था देखभाल और शिक्षा (ईसीसीई) के विकास का अध्ययन करता है जो परंपरागत भारतीय ज्ञान प्रणालियों (आईकेएस) में निहित बालक के समग्र विकास के दृष्टिकोण पर बल देता है। यह अध्ययन यह परीक्षण करता है कि वैदिक जैन और बौद्ध दर्शनों से प्राप्त हुई प्राचीन शैक्षिक प्रथाओं/अभ्यासों ने बालकों के शारीरिक बौद्धिक भावनात्मक और आध्यात्मिक विकास का किस प्रकार पोषण किया है। वैदिक अनुष्ठान गुरुकुल प्रणाली आयुर्वेद और अहिंसा एवं सचेतनता (Mindfulness) के सिद्धांतों ने बालक के संज्ञानात्मक और नैतिक विकास को आकार देने में महत्वपूर्ण भूमिका का निर्वहन किया है ।

शिशुओं की प्रारम्भिक देखभाल एवं शिक्षा के सन्दर्भ में भारतीय ज्ञान परम्परा की प्रासंगिकता

प्रायः एक सहस्राब्दी तक बहुविध आक्रमण की मार झेलते भारत की समृद्ध शैक्षिक परम्पराएँ विशेष रूप से शिशु की प्रारम्भिक शिक्षा की उन्नत मनोवैज्ञानिक परम्परा लुप्तप्राय हो चली हैं । समाज के सदस्य के रूप में हमारा नैतिक कर्तव्य है कि हम उन परम्पराओं को पुनर्जीवित करें जिसने अतीत में सर्वविध समृद्ध भारत की ओर समूचे विश्व को आकर्षित किया था । किसी भी परम्परा का विकास क्रोड में खेलने वाले शिशु में उसके बीजारोपण के द्वारा ही किया जा सकता है । वर्षों के शिक्षण व अनुभव-जन्य ज्ञान पर आधारित यह लेख भारतीय वाङ्मय के आलोक में लिखा गया है । भारतीय ज्ञान परम्परा के ये तथ्य आज भी प्रासंगिक हैं एवम् उन्नयन के विराट राजमार्ग के द्वार खोलते हैं ।

Empowering Women through Early Childhood Care and Education (ECCE) A Critical Analysis in the Context of NEP 2020

This article critically examines the role of Early Childhood Care and Education (ECCE) initiatives under India' s National Education Policy (NEP) 2020 in empowering women. It explores how ECCE programs contribute to enhancing women' s socio-economic status educational attainment and participation in the workforce. By analysing policy frameworks implementation challenges and global perspectives on ECCE the study highlights opportunities to promote gender equality and inclusive development through targeted interventions. The findings underscore the transformative potential of ECCE in fostering equitable access to education and empowering women as caregivers educators and economic contributors in society.

Psychological Perspective of Early Childhood Care Education (In the light of National Education Policy 2020)

This paper provides a consolidated view of three psychological theories namely Developmental Theory of Jean Piaget Constructivist Theory of Vygotsky and Attachment Theory as proposed by John Bowlby that offer valuable insights into Early Childhood Care Education especially in the context of National Education Policy 2020. Paper explores the major contribution of these Psychological Theories with special reference to their approach to understand the Early Childhood Care and Education. It also explores the Bharatiya Thoughts as background of these thoughts.

कुट्टकगणितद्वारा रविमन्दोच्चभगणोपपत्तिप्रदर्शनम्

हेतुवादपुरस्सरं वस्तुस्थापनमेव उपपत्तिः । इह गणितस्कन्धे उपपत्तिमानेव आगमः प्रमाणम् । अतः उपपत्त्या ये भगणाः सिद्ध्यन्ति ते एव ग्राह्याः । रविचन्द्रादीनां ग्रहाणाम् भगणान् वयं वेधद्वारा एव उपपादयितुं शक्नुमः । किन्तु मन्दोच्चादीनां तु अनेकैः वर्षशतैः एको भगणः पूर्यते । मनुष्यस्य आयुः अधिकाधिकं शतवर्षमितं वा ततोऽपि किञ्चिदधिकं वा भवितुमर्हति । अत एव मन्दोच्चादीनां भगणानां वेधं कर्तुं मनुष्येण न शक्‍यते । अतः मन्दोच्चादीनां भगणोपपत्तिप्रदर्शनार्थं कुट्टकविधिः गणकैः आश्रितः । सिद्धान्तशिरोमणिग्रन्थे ग्रहगणिताध्याये मध्यमाधिकारे कालमानाध्याये भास्कराचार्येण कुट्टकगणितद्वारा रविमन्दोच्चभगणोपपत्तिं कथं प्रदर्शयितुं शक्‍यते इति प्रतिपादितमस्ति । तं च क्रमं गणितरूपेण शोधपत्रेऽस्मिन् निरूप्यते ।

श्रीमद्भागवतमहापुराणान्तर्गतमङ्गलपद्यत्रयस्य सामासिकविमर्शः

निगमकल्पतरोर्गलितफलभूतं श्रीमद्भागवतमेकतः परमभक्तैरास्वाद्यं वर्तते । अपरश्च विद्वद्भिरपि संसेव्यं विद्यते तद्यथा – विद्यावतां भागवते परीक्षा’ अस्य श्रीमद्भागवतशास्त्रस्य वैशिष्ट्यमनेनैव स्पष्टं भवति यदाधुनिकेऽस्मिन् परिवेशेऽपि सर्वत्र एतत्कथामन्दाकिनी प्रवहन्ति दृश्यते । तथैव विद्वान्सोऽपि विविधटीकाप्रणयनेन निरन्तरमस्य महाग्रन्थस्य ग्रन्थिभेदनं कृतवन्तः । यद्यपि विद्वद्भिः टीकाकारैश्चेदं शास्त्रमधिकृत्य व्याकरणशास्त्रदृष्ट्यापि सुबहुप्रतिपादितं तथापि विद्वान्सः किमपि नूतनं स्फोरयितुं शब्दशास्त्रीयं चिन्तनमत्रानारतं कुर्वन्त्येव । श्रीमद्भागवतशास्त्रस्य प्रारम्भिकाणि मङ्गलपद्यान्यत्यन्तमेव सरसानि भावपूर्णानि च वर्तन्ते । दार्शनिकदृष्ट्यापि विद्वद्भिर्मङ्गलपद्यपरिशीलनं विधीयते । यथाऽस्माभिः पूर्वमपि निर्दिष्टं यद् व्याकरणशास्त्रस्य विविधानि तत्त्वानि नवनवार्थानुसन्धाने विशिष्टां भूमिकां निर्वहन्ति तस्मादेव अस्माभिरत्र प्रारम्भिकमङ्गलपद्यत्रयस्य समासशास्त्रीयं परिशीलनं विधीयते। अत्रेदमुल्लेखनीयं यच्छलोकघटकीभूतानां पद्यानां विग्रहप्रकारोऽपि नूतनार्थानुसन्धाने महत्त्वपूर्णां भूमिकां निर्वहति ।

प्राचीनभारते गुरुकुलशिक्षायाः महत्त्वम्

येन केन प्रकारेण उदरपूर्तिः मानवस्य उद्देश्यं नास्ति । आहार-निद्रा-भय-मैथुनादयः क्रियाकलापाः पशुप्राणिषु अपि प्राप्यन्ते एव येन केनापि प्रकारेण आहारप्राप्तिः तेषाम् उद्देश्यं भवति । किन्तु मानवस्य तथा नास्ति मानवस्य उद्देश्यं मोक्षप्राप्तिः अस्ति । अतः मोक्षप्राप्तिनिमित्तं सात्त्विकभावनया गुरुकुले गुरोः समीपे उपविश्य अध्ययनं तपोयुक्तजीवनं च आवश्यकमिति कारणेन ज्ञायते यत् गुरुकुलशिक्षायाः महत्त्वम् अत्यधिकमस्ति ।

Vaiśeṣika Darśana as an ancient source of Physical Properties of the substances

We can find many scientific terms in ancient Indian Literature and Darśanas are mainly among them. Six Darśanas are famous for their philosophy. From these Darśanas the Vaiśeṣika Darśana is mainly related to physics. The philosophy in this Darśana is very much similar to modern scientific concepts. Six padārthas (Dravya Guṇa Karma Sāmānya Viśeṣa and Samvāya) are used in Vaiśeṣika Darśana to classify all known objects. Among those is the Guṇa which is divided into three categories solids liquids and gases which are comparable to the physical properties in use today. The current paper aims to establish a correlation between the notions of liquid and liquidity found in select texts from the Vaiśeṣika Darśana tradition and those notions recognised by contemporary science.

Pecularities of Śara and Vibhīdaka with special reference to Śrauta sacrifices

Usually the grass used as base while setting a sacrificial fire is ‘Kuśa’ and ‘Idhma’ is made from the wood of Palāśa and Khaira trees. However all the Abhicārātamaka Iṣṭis have been prescribed by the Śruti to use ‘Śara’ grass and ‘Vibhīdaka’ wood respectively for these purposes. The Śrauta literature also clearly bans the use of ‘Śara’ and ‘Vibhīdaka’ in any other religious rites. Why are then these prescribed for the Abhicāra? Many scholars explain this prescription based on similarity of lexical terms (Śabdasāmyatva). But do these plants have some specific characteristics that qualify them for being used specifically in these Iṣṭis? This research article tries to delve into this in detail.

भारतीयज्ञानप्रणाली शोधकार्याणि च

आर्षज्ञानगर्भाः वेदराशयः। दीर्घकालिकानां संघर्षाणां परिणामेन परम्परायाम् अस्याम् आरोहावरोहः दरीदृश्यते । एतस्मिन् ज्ञानराशौ विधीयमानः श्रमः अनेन संघर्षेण कदाचित्कतया प्रभावाश्रयेण अपि संक्रमितः जातः । तथापि सेयं सनातनी ज्ञानपरम्परा अस्माकं या च यथाकालं जीवनसंघर्षैः विलुण्ठमानानाम् अस्माकं जीवधारिणां पुनर्पुनरपि विकसनाय सामर्थ्यशालिनी वर्तते । भारतीय-उच्चशिक्षायाः ज्ञाननिर्माणस्य उद्देश्यं प्रतिनित्यं समृद्धं स्यात् इति धिया शोधकार्याणि अभीष्टोद्देश्यानि आधारीकृत्य प्रवर्तनीयानि एव । इत्यतः शोधक्षेत्राणां चयनोद्देश्येन लेखनक्रमः अयं संकल्पितः अस्ति ।

Developing the Textbook In the context of learning `HOW TO LEARN’

Indeed with the quickly-changing employment landscape and global ecosystem it is becoming increasingly important that children not only learn but more importantly learn how to learn. Education must thus move towards less content and more towards learning about how to think critically and solve problems how to be creative and multidisciplinary and how to innovate adapt and absorb new material in novel and changing fields. (Introduction NEP 2020)

योगक्षेम-विमर्श

योगक्षेम भारतीय ज्ञान परम्परा का वह प्रबन्धन है । जिसे इन्द्रियजय विनय और विद्या आदि उपकरणो से सुसज्जित होकर अपने कुटुंब-समाज तथा देश के प्रति उत्तरदायित्व एवं लोक-कल्याण की भावना का विकास सुरक्षित है । योगक्षेम ‘कर्म’ के उस वैज्ञानिक दृष्टिकोण को परिभाषित करता है । जिसमें भारतीय परम्परा का सार प्रदर्शित होता है ।

Readiness of Sanskrit Institutions for Digital Marketing

The article argues that Sanskrit institutions should use internes to promote Sanskrit widely. This can be done only when the products and services are delivered online and Google identifies them automatically. Use of Social Media is another important factor to reach the wide spectrum of users. But for this the website should be ‘SEO friendly’. Evaluation is done with the help of online tools. The results are tabulated for getting a bird’s eye view. The article suggests that digital marketing can help Sanskrit Institutions to overcome these barriers and create a positive image and reputation for Sanskrit.

Analytical Study of Artificial Intelligence

Abstract This branch of computer science is concerned with making computers behave like humans. Artificial intelligence includes game playing expert systems neural networks natural language and robotics. Currently no computers exhibit full artificial intelligence (that is are able to simulate human behavior). The greatest advances have occurred in the field of games playing. The best computer chess programs are now capable of beating humans. Today the hottest area of artificial intelligence is neural networks which are proving successful in a number of disciplines such as voice recognition and natural-language processing. There are several programming languages that are known as AI languages because they are used almost exclusively for AI applications. The two most common are LISP and Prolog. Artificial intelligence is working a lot in decreasing human effort but with less growth.

स्मृतिसुमन (आचार्य शिवनारायण शास्त्री)

आचार्य शिवनारायण शास्त्री अपने-आप में एक सम्पूर्ण संस्था थे । वे सिद्ध पुरुष थे । किसी के प्रति ‘द्वेष’ तो न रखते थे पर हाँ ‘राग’ अवश्य ही बहुत ही रखते थे । मित्र ऐसे कि बात-बात पर ‘स्नेह’ टपकता था.... मैंने उन्हें आजीवन केवल दो ही कर्मों में ही लीन पाया.... वह भी निष्काम भाव से... एक, अध्ययन-अध्यापन.. दूसरे, समाज-सेवा । मुझे नहीं लगता कि उनमें कोई दूसरा चिन्तन प्रविष्ट भी हो पाया । वे योगी थे.....

निरुक्त-शास्त्र के उद्भव की पृष्ठभूमि

भाषा, अग्नि और चक्र (चक्का, पहिया) ये तीन वस्तुएँ मनुष्य की अनवरत प्रवृत्त जीवनयात्रा के लिए सर्वाधिक उपयोगी उपकरण सिद्ध हुए हैं । इन तीनों में सर्वाधिक प्राचीन एवं महत्त्वपूर्ण उपकरण है भाषा । अग्नि दैवी वस्तु है, पर उसका उपयोग मनुष्य के हित में स्वेच्छया किया जा सकता है, यह रहस्य भेदन पूर्णतः मनुष्य की अपनी कृति है । चक्र के तो आविर्भाव का पूरा ही श्रेय मनुष्य को प्राप्त है । परन्तु भाषा इस प्रकार आधे रूप में या पूर्ण रूप में मनुष्य का अपने बलबूते से किया आविष्कार नहीं है ।

निर्वचन और निरुक्त शब्दों का इतिहास

जैसा कि आपाततः स्पष्ट प्रतीत होता है निर्वचन और निरुक्त शब्द निर् + वच् से व्युत्पन्न हैं । निर्वचन के अर्थ पर श्रीमद् दुर्गसिंह का कहना है कि परोक्षवृत्ति या अतिपरोक्षवृत्ति शब्द में छुपे हुए अर्थ को निकाल करके, अर्थात् शब्द के सब अवयवों को अलग-अलग करके, कहना निर्वचन कहलाता है । यह तो है यौगिक अर्थ । निर्वचन और निरुक्त शब्द योगरूढ हैं । अर्थात् इनसे केवल छुपे हुए अर्थ को निकालकर कहने का ही भाव नहीं प्रकट होता, अपितु इस प्रकार कहने वाला शास्त्र अर्थ प्रकट होता है । ये दोनों शब्द कब से इस विशिष्ट अर्थ में रूढ हुए ?

‘मृदु शक्ति’ के रूप में संस्कृतशिक्षा

‘कृण्वन्तो विश्वमार्यम्’ (अर्थात् ‘इस विश्व को आर्य-भाव की मानव-स्थली बनाओ।’) ‘शिक्षा जीवन जीने और वर्तमान जीवन तथा जीवन के पश्चात् के समय को समझने की तैयारी है ..... शिक्षा राजनैतिक एवं सामाजिक आवश्यकता है ...... विजय प्राप्ति, शांति का संरक्षण, उन्नत्ति की प्राप्ति, सभ्यता का निर्माण और इतिहास की रचना युद्धभूमि में नहीं वरन् शैक्षिक संस्थानों, संस्कृति के उपजाऊ स्थलों में ही की जा सकती है। अतः शिक्षा को प्रज्ञा प्रदायी के रूप में स्वीकार किया जाता है।’

शास्त्रशिक्षणे गुणवत्तासंवर्धनाय सप्तपदी

भारतीयपरम्परायां धर्माधर्मयो: सदसतो: कर्त्तव्याकर्त्तव्ययो: विवेकं कर्तुं श्रुतिस्मृतिशास्त्रप्रमाण्यन्तरेण नास्त्यन्यच्छरण्यम् अत एव एवं जातीयकं प्रमाणभूतं शास्त्रम् अस्मत्संस्कृते: जीवातुभूतं वरीवर्ति । शास्त्राणि नैकानि सन्ति, तद्यथा – व्याकरणशास्त्रं, निरुक्तशास्त्रं , योगशास्त्रं धर्मशास्त्रं, ज्योतिषशास्त्रं,गणितशास्त्रं, इत्यादीनि । एतेषां शास्त्राणां शिक्षणपरम्परा अतिप्राचीनकालाद् अजस्रम् अनुवर्तते । तत्र शास्त्रशिक्षणेन शास्त्रस्यैषा परम्परा रक्षिता भावति , किञ्चानेन शास्त्रज्ञानेन ऐहिकामुष्मिकफलावाप्तये सौकर्यं भवति अपि च – ज्ञानं मनुजस्य तृतीयं नेत्रम् इति उक्तत्वात् नहि ज्ञानेन सदृशं पवित्रमिह विद्यते

पाणिनीय-सूत्राणां गणितत्वे प्रत्ययचराः

भारतीयज्ञानवाङ्मये द्वयोरपि समानं महत्त्वं विद्यते न केवलं महत्त्वं दृष्ट्या अपितु नियमबद्धत्त्वात् द्वयोः प्रकृतिरपि समाना एव । गणिते यथा नियमानां, सूत्राणाञ्च कारणात् त्रुटेश्वसरो न दीयते तथैव संस्कृते अपि व्याकरणस्य नियमानां, सूत्राणाञ्च प्रभावात् अशुद्धये अवकाशो न विद्यते । अयमेव गुणः द्वयोः प्राणतत्त्वमित्यभिज्ञायते । भारतीयविज्ञानस्य इतिहासे एकं विशिष्टकार्यं, यस्य प्रभावः परवर्ती गणितीयग्रन्थेषु दृष्टः तच्च विशिष्टकार्यं भाषाविज्ञानस्य प्रणेता भगवता पाणिनिना व्याकरणअष्टाध्य्यायी नामकः कश्चन ग्रन्थः संग्रन्थ्य सुसम्पादितम् ।

पाणिनीय-भाषा-विज्ञानम्

सर्वव्यवहारसाधिका मानवं मानवनिर्मात्री मूकजगते शब्दप्रदायिनीयं वाक् यदि नाभविष्यत्तर्हि जगतः कल्पना शिल्पकारस्य मूर्तिमात्रं स्यात् । उच्यते खलु – इदमन्धं तमः कृत्स्नं जायेत भुवनत्रयम् । यदि शब्दाह्वयं ज्योतिरासंसारं न दीप्यते ॥ काव्यादर्शः १.४ लोकाय सर्वादौ वाक्प्रदायिका विश्वस्य सम्पन्नतमस्य आदिमग्रन्थस्य भाषा दैवीवाक् संस्कृतम् एव, यतः विश्वस्य प्रथमाक्रिया प्रारब्धा । तथा हि – अनादिनिधना नित्या वागुत्सृष्टा स्वम्भुवा । आदौ वेदमयी दिव्या यतः सर्वाः प्रवृत्तयः ॥ महाभा. शा.पर्व अ. २२४/५५ अनादिनिधनं ब्रह्म शब्दतत्वं यदक्षरम् । विवर्ततेऽर्थभावेन प्रक्रिया जगतो यतः ॥ वाक्यपदीयम् १.१ ज्ञानराशिः शब्दब्रह्मात्मकः वेदः स्वषडङ्गैः परिपूर्णो वर्तते । षडङ्गानि च शिक्षा, कल्पः, व्याकरणम्, निरुक्तम्, ज्योतिषम्, छन्दः इति ।

नागेशदिशा शक्तिनियामकविचारः

सारांशः – लेखेऽस्मिन् नागेशभट्टदिशा शक्तिनियामकानां संयोगविप्रयोगादीनां विवरणं कृतं वर्तते। अत्र शक्तिनियामकान् सोदाहरणानि भाष्यादिप्रामाण्येन व्याख्याय समीक्ष्य च अयं निष्कर्षः प्रतिपादितोऽस्ति – 1. वस्तुतः अत्र ( नानार्थकेषु ) सामर्थ्यमेव मुख्यं निर्णायकं वर्तते संयोगादयस्तु तद्व्यञ्जकप्रपञ्चाः सन्ति । 2. नागेशेन शक्तिनियामकानां व्याख्याप्रसङ्गे भर्तृहरेः कारिकाद्वयस्य व्याख्यायाम् उदाहरणेषु च किमपि नूतनं स्वोपज्ञं तथ्यं न प्रतिपादितम् । 3. नागेशव्याख्यापरिशीलनेन तथ्यमिदमवगतं भवति यद् नागेशः सर्वत्र पुण्यराजम् अनुकरोति । यत्र पुण्यराजस्य अनुकरणं न वर्तते तत्र काव्यप्रकाशकर्त्तुः मम्मटस्य अनुकरणं कृतं वर्तते ।

कम्प्यूटर विज्ञान में संस्कृत की उपयोगिता

शोधसार - वर्तमान समय में कम्प्यूटर विज्ञान नए - नए अनुप्रयोगों एवं अनुसंधानों के आधार पर प्रतिदिन नए आयाम प्राप्त कर रहा है। कम्प्यूटर विज्ञान जगत में आए दिन विभिन्न प्रकार के एडवांस एवं आधुनिक तकनीकियों से युक्त साफ्टवेयर एवं हार्डवेयर का अविष्कार हो रहा है जिनके माध्यम से दैनिक जीवन से लेकर बड़े से बड़े कार्यों को आसानी से संपन्न कराया जा रहा है।संस्कृत के लिए कम्प्यूटर की उपयोगिता एवं आवश्यकता वर्तमान समय में न्यायोचित है संस्कृत के कठिन एवं वृहत् सूत्रों को अनुवाद करके उन्हे अन्य भाषाओं में परिवर्तित करना तथा डिजिटलाईज करके ऐसे सभी ग्रन्थों को अधिकाधिक समय के लिए सुरक्षित रखा जा सकता है। परन्तु भारतीय ज्ञान परंपरा के अभूतपूर्व ज्ञान भण्डार में आज से हजारों वर्ष पूर्व भी ऐसा तकनीकी ज्ञान सूत्रों एवं ग्रन्थों के माध्यम से प्राचीन विद्वानों एवं महर्षियों ने लिख रखा है उक्त संभी प्राचीन ग्रन्थ एवं सूत्र संस्कृत भाषा में लिखे गए थे । आज उन सभी ग्रन्थों को पढ़ने एवं अनुसंधान करने हेतु कम्प्यूटर विज्ञान की सहायता से विभिन्न भाषाओं में तथा कम्प्यूटर की सहायता से अनेको साफ्टवेयर के निर्माण में संस्कृत भाषा आधारित उ

ॠग्वेद-संहिता में भाषा-दर्शन

ॠग्वेद-संहिता विषय की दृष्टि से स्तुति-साहित्य है । अतः भाषा-चिन्तन इस का प्रति-पाद्य नहीं है । परन्तु साहित्य की यह एक विशेषता होती है कि यह उन बहुत-सी अन-कही कहानियों को भी कह देता है, जिन्हें कहना शायद वक्‍ता ने भी आवश्यक नहीं समझा हो । भाषा-चिन्तन भी उन्हीं अन-कही कहानियों में से एक है ।

ऋग्वेद-संहिता, प्रथमाष्टक के प्रथम अध्याय की छन्दोमीमाँसा

इस निबन्ध मेँ ऋग्वेदसंहिता के प्रथम अष्टक के अष्टाक्षर गायत्री मेँ निबद्ध १७ और अनुष्टुप छन्द मेँ निबद्ध २ सूक्तों के कुल १९४ मन्त्रों की समीक्षा अक्षरपरिणाह की दृष्टि से की गई है । इस के अतिरिक्त वैश्वामित्र मधुच्छन्दस् के एकमात्र और सूक्त (९.१ ) के दस मन्त्रों की मीमांसा भी इससे उनका अध्ययन पूरा हो जाने की दृष्टि से की गई है।

रसशास्त्रस्य परिप्रेक्ष्ये रसः इति पदस्य अर्थनिरूपणम्

उपनिषदि विद्या द्विविधा उक्ता अस्ति परा अपरा च इति । तत्र पराविद्यया ब्रह्मविद्या आत्मविद्या वा प्रतिपादिता । अनया अक्षरस्य ज्ञानं भवति । न क्षरति इति व्युत्पत्त्या अक्षरेण अविनाशिनः कूटस्थस्य नित्यस्य आत्मनः बोधः भवति । एतस्याः ब्रह्मविद्यायाः लाभः केवलं धर्ममार्गेणैव साध्यते । अस्माकं शरीरम् एव धर्मसाधनस्य कर्मसाधनस्य वा क्षेत्रम् अस्ति । अतः धर्माचरणाय शरीरं सुष्ठु संरक्षणीयम् । यद्यपि इदं शरीरं नश्वरम् अस्ति तथापि अस्य सुष्ठु परिचालनेन अस्माकं भुक्तिः मुक्तिः च इति उभयोः प्राप्तिः संसाध्यते । अस्मिन् जगति शरीरम् अकृत्रिमरूपेण तथा च प्राकृतिकरूपेण संरक्षितुं केवलं रसविद्या एव पर्याप्ता अस्ति । तदर्थम् उच्यते -

वाटिकाविधाने ज्योतिषस्य उपादेयता

वाटिकाविधानम् अथवा उपवनविधानम् एकं महत्त्वपूर्णं सामाजिकं कर्म भवति । भारतीयधर्मशास्त्रे एतत् पूर्त्तकर्मसु एकं भवति । वाटिकायाः अथवा उपवनस्य शोभाः विभिन्न-प्रकारकैः पादपैः भवति, ते पादपाः यथोचिते काले रोपणेन एवं च यथाकालं तेषां सेचनेन ते संवर्धिताः सन्तः यथाकालं फलपुष्पादिभिः समन्विताः भवन्ति इत्यतः वाटिकाविधानसमये अथवा उपवनविधानसमये कालस्य विचारः अवश्यं करणीयः भवति । कालस्य बोधनार्थम् एव ज्योतिषशास्त्रं प्रवर्तितम् ।

‘सर्वं परित्यज्य कृषिं यत्नेन कारयेत्’

अन्नमयः कोशः, प्राणमयः कोशः, मनोमयः कोशः, विज्ञानमयः कोशः एवञ्च आनन्दमयः कोशः मानवीयजीवनस्य विकास-सन्दर्भे तैत्तिरीयोपनिषदि पञ्च-कोशानां चर्चा कृता वर्तते । एषा चर्चा मूलरूपेण मानवस्य सम्पूर्ण-व्यक्तित्वस्य चर्चा एव भासते । स्पष्टमेव यत् एतेषु पञ्चकोशेषु अन्नमयः कोशः एव सर्वेषाम् अन्येषां कोशानाम् आधारः वर्तते । एषः कोशः मूलतः मानवस्य शरीरस्य स्वरूपं स्पष्टीकरोति । अतः शरीरस्य विकासार्थम् अन्नस्य आवश्यकता भवति –

संस्कृतवाङ्मये शिक्षणाधिगमप्रक्रियायाः स्वरूपम्

अध्ययनम्, पठनम्, अधीतिः, अवबोधः, अवगमनम्, अर्जनम् अधिगमनं च इत्येषु सर्वत्र ज्ञानग्रहणस्य प्रक्रिया एव प्रमुखा वर्तते । अथवा एवम् अपि वक्तुं शक्यते यत् अधिगमनादिषु ज्ञानं निहितं तथा ज्ञाने अधिगमनादीनीति । अत एव प्रायः सर्वैरपि भारतीयदर्शनैः ज्ञानग्रहणस्य अधिगमस्य वा कस्याश्चित् विशिष्ट-प्रक्रियायाः निरूपणम् अवश्यम् एव कृतम् । अस्यां प्रक्रियायां मनसः प्रधानभूतं स्थानं वर्तते इति ।

संस्कृतस्य भाषिकविविधता असमीयाभाषायां संस्कृतप्रभावः

‘भाष्’ इति धातोः ‘भाषा’ इति शब्दः निष्पद्यते, यस्यार्थः भवति प्रकाशकरणमिति । ‘भास्’ ‘भाष्’ च धातुद्वयं पृथक्तया वर्तते । भाषया एव सांसारिकः व्यवहारः सम्भवति । अतः कथितम् -

सामवेदे स्तोभ: लक्षणं स्वरूपश्च

सामगाने ऋगतिरिक्तः प्रयुज्यमानः वर्णः स्तोभः कथ्यते। सामवेदस्य लक्षणग्रन्थेषु स्तोभस्य स्वरूपस्य विस्तृतं विवरणं प्राप्यते। सर्वप्रथमं संहि.ब्रा. इत्यस्मिन् स्तोभस्योल्लेखः स्पष्टरूपेणाभवत्। एवञ्च कथितमस्ति यत् स्तोभः साममोनि ऋचि कुत्रापि न भवति। किन्तु सामगाने सर्वत्र प्रवृत्तो भवति। तत्र स्तोभस्य विशेषणस्वरूपे सर्वत्र गताः शब्दस्य प्रयोगः कृतः वर्तते। यस्याभिप्रायोऽपि सायणानुसारं सर्वासु देवतासु व्याप्तं भवितव्यम्। यतो हि स्तोभ सर्वस्यै देवतायै प्रयुक्ते साम्नि दृश्यते।

वेदाङ्गानि : आवश्यकता स्वरूपञ्च

अस्मिन् लेखे वेदानाङ्गां सामान्यः परिचयः प्रतिपाद्यते । एतानि सर्वाण्यपि अङ्गानि वेदस्याध्ययने साहायकानि भवन्ति । एतेषामङ्गानामध्ययनेन भाषाविषये उच्चारणविषये शब्दानां व्युत्पत्तिविषये च ज्ञानं सुदृढं भवति ।

व्याकराणाध्ययनस्य प्रयोजनम्

भाषायाः माध्यमेन एव वयं सर्वविधस्य जागतिकस्य ज्ञानस्य व्यवहारस्य च सम्पादनं कुर्मः । तथा च भाषायां व्याकरणस्य नियमनं भवति । अतः भाषायाः शुद्धं स्वरूपं अवगन्तुं व्यकारणज्ञानम् आवश्यकम् । व्याक्रियन्ते व्युत्पाद्यन्ते असाधुशब्देभ्यः साधुशब्दाः पृथक् क्रियन्ते इति व्याकरणम् । साधुशब्दानां ज्ञानम् एव व्याकरणाध्यनस्य प्रयोजनम् अस्ति । पतञ्जलिविरचिते व्याकरणमहाभाष्ये रक्षोहागमलघ्वसन्देहाः इति व्याकरणाध्ययनस्य प्रयोजनानि उक्तानि । तान्येव अत्र अस्मिन् लेखे विव्रियन्ते ।

Cultivating Professional support through Continuous Professional

This research paper explores the systematic approach to Continuous Professional Development (CPD) for Sanskrit teachers in Delhi focusing on the collaboration between the State Council of Education Research and Training Delhi (SCERT-Delhi) and the Samskrit Promotion Foundation (SPF) Delhi. Through a structured CPD program aligned with the National Education Policy 2020 (NEP 2020). The initiative was aimed to enhance the pedagogical skills and professional competencies of Sanskrit teachers of the Directorate of Education Delhi. This study evaluates the effectiveness of the CPD program the selection process of Master Trainers and the feedback from participants providing insights into the impact of such initiatives on the professional growth of Sanskrit language teachers.

कश्चन विलक्षणप्रतिभावान् युवा आर्यभटो नाम

व्याख्याकर्ता मल्लिनाथ-सूरिः यथा महाकवि-कालिदासेन सह सम्बद्धः अस्ति, तद्वत् भास्कराचार्यः (प्रथमः) आर्यभटेन सह सम्बद्धः भवति । अर्थात् आर्यभटेन उक्तानां विषयाणां समुचितं विवरणं भास्कराचार्येण (प्रथमेन) कृतम् आसीत् । ऋते भास्कराचार्यस्य कृतेः, आर्यभटेन उक्ताः केचन विषयाः दुर्बोधाः एव तिष्ठेयुः । अस्य भास्कराचार्यस्य वचसा आर्यभटस्य विषये एवं कथ्यते -

उपनिषत्सु शैक्षिकचिन्तनम्

मनुष्यस्य सर्वाङ्गीणविकासाय महदुपकारिका गुरुकुलपरम्परा । उपनिषदोऽपि इमां गुरुकुलपरम्परां डिण्डिमघोषेण समर्थयन्ति । एतेषु गुरुकुलेषु काले काले यज्ञानुष्ठानानि विद्वद्सम्मेलनानि अपि आयोज्यन्ते स्म । विद्वद्सम्मेलने समागतानां विदूषां विचारः शैक्षिकचिन्तनं दृढयति । सामाजिकता सौहार्दता सौख्यं च अनेन प्रतिपादितं भवति । शीलं, परोपकार:, विनय:, क्षमा, धैर्यम्, अलोभश्चेति विद्याया: उज्ज्वलं फलम् ।

द्रव्याणां कर्मसामर्थ्यम्

आहारद्रव्यं सर्वप्राणिनां पोषकेन्धनम् । जीवनस्य त्रिषु उपस्तम्भेषु आद्यः स्तम्भः आहारः वर्तते । देहधारणं पोषणं च तेन विना असाध्यम् । तद्वत् औषधद्रव्याणि अपि दोषादिकानां शमनं, रोगनिवारणं, स्वास्थ्यस्थापनं च कुर्वन्ति । देहपोषकाः आहाराः तथा रोगनिवारकाणि औषधानि च शरीरे कयाचित् शक्त्या कार्यं कुर्वन्ति । तेषु विद्यमानाः केचन अंशाः शरीरस्थानां दोष-धातु-मलादिकानां पोषणं कर्षणं वा कुर्वन्ति ।

चीनदेशीयं ज्योतिषम्

भारतीयज्योतिषं चीनदेशीयज्योतिषं तथा च पाश्चात्यज्योतिषमिति त्रिविधस्य ज्योतिषस्य व्यवहारस्य आधिक्यम् आधुनिककाले अनुभूयते । ज्योतिषशास्त्रस्य प्रवर्तने अस्य शास्त्रस्य दैनन्दिनव्यवहारे उपयोगिता एव अस्ति ।

वैदिके लौकिके च संस्कृतसाहित्ये पर्यावरणम्

पर्यावरणेन प्रकृत्या सह वा मानवस्य घनिष्ठः सम्बन्धः वर्तते । पर्यावरणं विना जीवनस्य कल्पनाम् अपि कर्तुं न शक्नुमः । जलं, वायुः, पृथ्वी, अग्निः, आकाशः, नद्यः, वनानि, प्राणिनः, पर्वताः, वृक्षलतादयः पर्यावरणीयतत्त्वानि सन्ति ।

नूतनशीक्षानीतेः (NEP 2020) परिप्रेक्ष्ये मूल्यानां विमर्शः

षट्त्रिंशद्वर्षेभ्यः अनन्तरं शिक्षानीतिः परिवर्तिता अस्ति । नूतनशिक्षानीतेः क्रियान्वयनं प्रारब्धम् अस्ति । मूल्यानां सन्दर्भे अस्यां नीतौ विहिता चर्चा न केवलं वर्तमानस्य भारतस्य समृद्ध्यर्थम् अपि तु भविष्यस्य भारतस्य निर्माणार्थम् अपि कृता अस्ति ।

प्राचीन भारत में शिक्षक-शिक्षा

शिक्षक-शिक्षण का रूप’ एक दीर्घ कालिक प्रक्रिया थी। गुरुकुल व्यवस्था के अन्तर्गत गुरुकुल में ही वास करने वाले अनेक अन्तेवासी गुरुकुल में रहते हुए सैद्धान्तिक एवं व्यावहारिक दृष्टि से निरन्तर शिक्षण एवं प्रशिक्षण प्राप्त करते चलते थे। पुनश्च अनेक प्रतिभाशाली अन्तेवासी वहीं रहकर शिक्षक का काम करने लगते थे।

भाषाविज्ञानम् अष्टाध्यायी च

भाषाविज्ञानस्य मूलभूता: चतस्र: शाखा: सन्ति । १.ध्वनिविज्ञानम् Phonetics २.शब्दरूपविज्ञानम् Morphology ३.अर्थविज्ञानम् Semantics ४.वाक्यविज्ञानम् Syntax च । पाणिनीव्याकरणे एतासां चतसृणां शाखानां बहूनि प्रमाणानि विलोक्यन्ते । पाणिनिना भाषास्वरूपं यथायथं परिरक्षितुं परिकरबन्ध: कल्पित: । एतस्मिन् परिकरबन्धे पाणिने: भाषाविज्ञानं स्फुटम् आविर्भूतं तदेतद् सारसंक्षेपेण अस्मिन् शोधपत्रे ईक्षामहे ।

अर्थावबोधन-प्रक्रिया (व्याकरणशास्त्रस्य परिप्रेक्ष्ये)

यदा वयं स्वविचारान् उपस्थापयितुम् आरभामहे तदा शब्दानाम्, शब्देभ्यः जनितानाम् अर्थानाञ्च विचारं मनसि पूर्वं कुर्मः एव । तेन ज्ञायते यत् ‘एषः शब्दः अमुम् अर्थं बोधयति’ इति । अत एव अस्माभिः तादृशानां शब्दानां प्रयोगः क्रियते, अर्थात् अर्थानुगुणं शब्दानां प्रयोगः क्रियते ।

वर्णोच्चारणविज्ञानम्

प्रपञ्चे या कापि भाषा भवतु, सर्वासां भाषाणां वैशिष्ट्यं वर्तते । प्रायः प्रत्येकं भाषायाः वर्णोच्चारणप्रक्रिया एकां भाषाम् अन्यभाषाभ्यः पृथक्करोति । वर्णोच्चारणम् एव शब्दम् अर्थेन सह योजयति । अतः भाषायाः शुद्धप्रयोगार्थम् ईप्सितभावाभिव्यक्त्यर्थं वर्णानां यथास्थानम् उच्चारणम् अत्यावश्यकं भवति । अतः प्रत्येकम् अपि जनः वर्णोच्चारणविज्ञानं जानीयात् । अस्मिन् लेखे भाषायाः तात्पर्यार्थः, वर्णव्यवस्था, उच्चारणस्थानानि, वर्णोद्भवः, अशुद्धोच्चारणेन जायमानाः समस्याः इत्यादयः बिन्दवः चर्चिताः सन्ति ।

आयुर्वेदे ज्योतिषशास्त्रीयाणां शब्दावलीनां प्रयोगः

आयुर्वेदे ‘कालगणना, दिनम्, रात्रिः, अहोरात्रः, पक्षः, मासः, तिथिः, मुहूर्तः, ऋतुः, अयनम्, सौरवर्षः, ग्रहः, नक्षत्रम्, पातः, ग्रहणम्’ इत्यादयः ज्योतिषीयविषयाः अपि यथावश्यकतया प्रयुक्ताः सन्ति । अतः आयुर्वेदस्य विद्यार्थिनां कृते तेषां विषयाणां सम्यक् ज्ञानम् अपेक्षितं भवति । तेषाम् अपेक्षितानां ज्योतिषीयविषयाणां ज्ञानेन विना अभीष्टस्य अर्थस्य अवबोधः भवितुं न अर्हति ।

Tatsama Vocabulary in Modern Bangla Language

The aim of this paper is to show the influence of tatsama i.e. Sanskrit loanwords in modern Bānglā Language. Sanskrit language, however, is considered the mother of all Indian languages and it has rich vocabulary. The tatsama vocabulary belongs to a higher and more erudite register than common words.

अलङ्काराणाम् उद्भवे मनोवैज्ञानिकप्रक्रिया

अलङ्काराणां केवलं बहिरङ्गत्वं स्वीकर्तुं न शक्यते । आलङ्कारिकाणां मतानुसारम् अलङ्काराः न केवलं वाणीं भूषयन्ति अपि तु भावाभिव्यक्तौ सहायकाः अपि भवन्ति । एतेषाम् अलङ्काराणाम् उद्भवे काचित् मनोवैज्ञानिकी प्रक्रिया अस्ति । अस्याः प्रक्रियायाः कल्पना, स्मृतिः, बिम्बप्रतिबम्बभावः, प्रतीकीकरणम् इति एते अंशाः सन्ति । एतेषाम् अंशानां वर्णनं कृत्वा सोदाहरणम् एषा प्रक्रिया अस्मिन् लेखे प्रतिपादिता अस्ति ।

भाषाशिक्षणे व्याकरणस्य योगदानम्

व्याकरणं भाषायाः केवलं नियामकः न, अपितु विश्लेषकः अपि अस्ति । भाषायाः गतिः व्याकरणेन अवरुद्धा न भवति । भाषा व्याकरणेन परिवर्तितापि न भवति । भाषा तु स्वगत्या चलति एव । व्याकरणं तस्याः गत्याः नियामकम् अस्ति, न तु अवरोधकम् । भाषाविज्ञानं व्याकरणं च इति शास्त्रद्वयम् अस्ति । उभयोः कार्यक्षेत्रं भिन्नं भिन्नं वर्तते । द्वे अपि परस्परं सहयोगिनी स्तः । व्याकरणं पदप्रयोगं विचारयति, किन्तु भाषाविज्ञानं पदस्य मूलम्, धातोः अथवा प्रकृत्याः व्युत्पत्तीनां विश्लेषणं करोति । एवं वक्तुं शक्नुमः यत् व्याकरणं भाषायाः मित्रम् अस्ति तां सन्मार्गे चलितुं प्रेरयति ।

शैक्षिकनिहितार्थानां सन्दर्भे बुद्धेः स्वरूपम्

शोधपत्रेऽस्मिन् साङ्ख्यदर्शनानुसारेण बुद्धेः विविधपक्षाणां शैक्षिकपरिप्रेक्ष्ये विवेचनं विहितम् । प्रस्तावनायां कोशाधारितान् बुद्धेः विविधार्थान् प्रदर्श्य निष्कर्षः प्राप्तः यत् सर्वत्रापि बुद्धिशब्दस्य प्रयोगः प्रायः ज्ञानार्थे कृतः वर्तते । अध्यवसायो बुद्धिः अर्थात् अन्तःकरणे यत् विशिष्टविषयकं निश्चयात्मकं ज्ञानं सा एव बुद्धिः । इति साङ्ख्यदर्शनोक्तार्थं विवेच्य धर्म-ज्ञान-वैराग्य-ऐश्वर्यमिति चत्वारः सात्त्विकभेदाः अधर्म-अज्ञान-अवैराग्य-अनेश्वर्यमिति चत्वारः असात्त्विकभेदाः प्रदर्शिताः । साङ्ख्यदर्शने एतेषां विस्तृतं व्याख्यानं वर्तते । धर्मस्वरूपा सात्त्विकबुद्धिः मानवं सदाचरणाय कर्तव्यपालनाय च प्रेरयति ।

उच्चारणसंशोधने पाणिनीयशिक्षायाः योगदानम्

प्रादेशिकभिन्नतायाः कारणात् जनानां वर्णोच्चारणे भेदः दृश्यते । देशप्रभावात् जातस्य अस्य भेदस्य वर्णनं पाणिनिना अपि शिक्षायां कृतम् । “यथा सौराष्ट्रिका नारी तक्रँ इत्यभिधीयते” इति । वर्णानाम् उच्चारणस्य अयं देशगतः भेदः वर्णानां निर्दिष्टस्थानं यावत् न बाधते तावत् दोषः इति वक्तुं न शक्यते । परं यदा एतद् उच्चारणं उक्तस्थानात् अतिरिच्य प्रवर्तते तदा तद् दोषयुक्तं भवति ।

संस्कृत-अनुसन्धाने नवीनक्षेत्राणि

पतञ्जलि:, पाणिनि:, पिङ्गल:, आर्यभट:, चरक; नागार्जुन:, कणाद:, स्टीव जाब्स , बिल गेटस्, न्यूटन, ग्यलिलियो, कोपरनिकस इत्यादय: महान्त: स्वीयप्रतिभाबुद्धिकौशलेन विज्ञानस्य, प्रविधे: अनुसन्धानस्य च नवीनानि क्षेत्राणि उद्घाटितवन्त: ।

शाब्दबोधप्रक्रियायां कारकसम्बन्धविचारः

वाक्यार्थज्ञाने पदपदार्थज्ञानं कारणं भवति इति वैयाकरणानां सिद्धान्तः। शाब्दबोधे कारकस्य एवञ्च विभक्तेः महत्त्वपूर्णं स्थानं भवति। विभक्तिः द्विधा विभज्यते - कारकविभक्तिः कारकेतरविभक्तिः च। कारकसम्बन्धः - पदस्य क्रियया सह यः सम्बन्धः भवति तत् कारकम् इति शब्देन व्यवह्रियते।

शब्दानाम् अर्थस्य अवगमने व्याकरणस्य भूमिका

यः वेदेषु शब्देषु कृतं लोपम्, आगमं आदेशं च जानाति सः एव वेदं सम्यक् रक्षयितुं शक्नोति नान्यः । वस्तुतः यः व्याकरणं न जानाति सः वेदार्थज्ञातुं न समर्थः एव यथा परमे व्योमन् अत्र व्योमन् शब्दः सप्तम्यर्थं बोधयति ।

त्रुटिविश्लेषणम्

‘त्रुटिः’ अध्यापकानां कृते समस्या न अपितु अवसररूपा एका महत्त्वपूर्णा सामग्री इति । आरम्भे त्रुटिविश्लेषणं व्यतिरेकीविश्लेषणस्य प्रक्रियायाः अङ्गत्वेन स्वीकृतं परन्तु भाषाधिगमप्रक्रियायां अस्य स्थानम् अधिकं प्रमुखं स्वतन्त्रं च अस्ति । भाषाध्ययने त्रुटिषु नियन्त्रणम् आवश्यकम् अस्ति ।

आत्मानं नैव जानाति यो न जानाति संस्कृतम्

सांसारिकविषयेषु अनासक्तः सन् मनुष्यः संस्कृतग्रन्थान् अधीत्य सर्वप्रथमम् आत्मनः विषये एव चिन्तयेत् अर्थात् आत्मानम् उद्धरेत् । यतो हि मनुष्यस्य आत्मा एव बन्धुः अस्ति आत्मा एव शत्रुः अस्ति । अस्मिन् लेखे आत्मानं ज्ञातुं संस्कृतं कथम् आवश्यकम् इति प्रतिपादितम् अस्ति ।

आदर्शसंस्कृतशिक्षकः शिक्षिका वा

यः सुमनसा सौम्यचित्तेन सौम्यप्रकारेण संस्कृतं संस्कृतमाध्यमेन पाठयति । परिवेशं संस्कृतमयं कृत्वा छात्रान् छात्राः वा संस्कृतम् अर्जयितुं प्रेरयति । तान्/ताः ‘जागरूकं’ कृत्वा ‘मानवीयं समाजं निर्मातुं’ प्रयत्नशीलः प्रयत्नशीला वा भवति सः/सा एव शिक्षकाणां धुरि स्थित्वा आदर्शमयशिक्षकस्य शिक्षिकायाः वा स्वरूपं प्रदर्शयति ।

महाभाष्यव्याख्यानुसारेण विभक्तिसूत्रविमर्शः

अन्नम्भट्टः शिवरामेन्द्रसरस्वती च इति एतयोः आचार्ययोः विभक्तिविषयकचिन्तने किं साम्यं किं च वैषम्यं वर्तते ? यदि तयोः विभक्तिविषयकावधारणायां किञ्चित् वैषम्यं वर्तते तर्हि तयोः कः आधिक्येन तर्कसङ्गतं युक्तियुक्तं च प्रतिपादनं करोति ?

आयुर्वेददृष्ट्या जीवनस्य स्वरूपम्

सङ्क्षेपेण आयुर्वेदशास्त्रे अस्माकं वैयक्तिकं दैनन्दिनजीवनम्, सामाजिकजीवनं, धार्मिकजीवनम्, आध्यात्मिकजीवनं च वर्णितं वर्तते । अस्माकं सुखकरं हितकरं दीर्घं च आयुः एतैः जीवनस्वरूपैः एव प्रभावितं भवति ।

धर्मशास्त्रोक्तरीत्या राज्ञः इन्द्रियजयः

इन्द्रियाणाम् उपरि विजयप्राप्तिः न कश्चन सामान्यः अकस्मात्साध्यश्च विषयः अपि तु सुदीर्घसमयाभ्यासस्य फलमेव । बहवः मुनयः ऋषयश्च साफल्यद्वारे समागतसत्त्वेऽपि मुहूर्तदुर्बलतया साफल्याद् वञ्चिताः अभवन् ।

सम्बोधनपदौचित्यम्

वाक्ये सम्बोधनपदस्य किञ्चित् विशिष्टम् एव महत्त्वम्। एकस्मिन् पक्षे इदं प्रयोक्तुः मनोदशां ज्ञापयति अन्यस्मिन् च पक्षे बोधयति यत् कस्याम् अवस्थायां कीदृशं सम्बोधनं प्रयुक्तम् अथवा प्रयोक्तव्यम् । श्रीमद्भगवद्गीतायाः एकादशः अध्यायः अस्य तत्त्वस्य एव प्रामाणिकतां प्रमाणयति । ‘कमलपत्राक्ष’ इति सम्बोधनपदम् अस्ति । कमलस्य पत्रे इव (दीर्घे रक्तान्ते परममनोरमे) अक्षिणी यस्य (तव) सः (त्वं) हे कमलपत्राक्ष, अत्र अर्जुनः प्रेमातिशयात् अतिसौन्दर्यकारणात् च भगवतः श्रीकृष्णस्य कृते एतस्य सम्बोधनस्य प्रयोगं करोति ।

संस्कृतशैक्षिकसमस्या : निदानम् उपचारः परामर्शः च

शिक्षा निरन्तरं प्रवाहमाना काचित् प्रक्रिया अस्ति । शिक्षाप्राप्तौ अस्मिन् जगति मानवः एव समर्थः अस्ति इत्यतः मानवः शिक्षया जीवश्रेष्ठत्वं प्राप्नोति । मानवं विना एतत् जगत् अविकसितम् अन्धकारमयं च अभविष्यत् । मानवस्य श्रेष्ठत्वस्य कारणं तु शिक्षा एव ।

भारतीयं मनोविज्ञानम्, भासनाटकचक्रे व्यक्तित्वस्वरूपम्

भारतम् अस्माकं देशः, एषा भूमिः कस्मिंश्चित् कालखण्डे ज्ञानेन संस्कृत्या च जगतीतले ख्यातनामा आसीत् । अस्मिन् एव देशे चतुष्षष्टिकलाः आविर्भूताः । तादृशीभिः ज्ञानसम्पद्भिः भरितं राष्ट्रम् अस्माकं भारतम् ।

संस्कृतप्रत्ययाधारितं सङ्गणकसहानुदेशनम् (छात्राभिवृत्त्युपलब्ध्यो: परिप्रेक्ष्ये)

आदिकालात् एव भारतवर्ष: ज्ञानस्य कोषो वर्तते। यद्यपि ज्ञानस्य विकासचक्रमत्रापि प्रतिक्षणं प्रचाल्यमानमस्ति, तथापि ज्ञानरूपवृक्षस्य बीजमारम्भादेव भारते विद्यमानमासीत्। भारतवर्षे ज्ञानस्य तथा सम्मानमासीत् यदत्र आदिग्रन्थस्य नाम ‘वेद:’ इति विहितम् । वेदस्यार्थ: ज्ञानमिति

संस्कृतशिक्षणसन्दर्भे बहुमाध्यमपुञ्जस्य प्रभावः

सर्वस्यापि अनुसन्धानस्य निष्कर्षाणां, सामान्यीकरणानाञ्च प्रस्तुतीकरणं भवति एव । एतदेकं महत्त्वपूर्णचरणं वर्तते। समस्तानुसन्धानस्य उपयोगितायाः, प्रभाव-शीलतायाश्च मूल्याङ्कनस्य अयमेव आधारः यदनुसन्धाने प्राप्तव्योद्देश्यानाम् अनुरूपेण प्राप्तिरभवत् उत ना? अस्मिन्नध्याये मूलभूतपरिणामाः प्रस्तूयन्ते।

कारकाणामधिगमे रेखीयाभिक्रमस्य प्रभावः

वेदाः सन्त्यानुसन्धातृभिः महर्षिभिरनुभूतस्य परमतत्त्वस्य बोधयितारो भूत्वा भुवि विभान्ति । यत्र प्रत्यक्षस्य न च अनुमानस्य प्रवेशस्तत्रापि ते प्रविशन्ति । एषामेव भारतीयसभ्यता-संस्कृतेश्चाधारमूलानां, शिक्षा वर्तते षडङ्गेषु आद्यमङ्गमत्र । स्वरवर्णाद्युच्चारणप्रकारो यत्र शिक्ष्यते उपदिश्यते च सा शिक्षेति ।

भारतीयशिक्षापरम्परा

शिक्षणस्य द्विधा प्रवृत्तिः दृश्यते । आधिभौतिकं शिक्षणम् आध्यात्मिकं शिक्षणं च इति । शिक्षायाः उद्देश्यानि पश्यामः चेत् अपि शिक्षायाः द्विधा प्रवृत्तिः दृष्टिपथम् आयाति । सदाचारः, परम्परायाः रक्षणम्, यथार्थस्य ज्ञानस्य प्राप्तिः, मोक्षः इति एतादृशानि शिक्षायाः उद्देश्यानि पश्यामः चेत् एतानि परस्परपूरकाणि सन्ति इति दृश्यते ।

आयुर्वेदस्य भाषा संस्कृतं पठ्यताम्

‘एतादृशाः आयुर्वेदग्रन्थाः अध्येतव्याः’ इति जनानाम् इच्छा भवति एव । किन्तु एतादृशाः आयुर्वेद-ग्रन्थाः संस्कृतेन लिखिताः सन्ति । अतः आयुर्वेदग्रन्थानां भाषायाः अवगमनाय ‘आयुर्वेदस्य भाषा संस्कृतं पठ्यताम्’ इति कश्चन पाठ्यक्रमः संस्कृत-संवर्धन-प्रतिष्ठानेन निर्मितः अस्ति ।

काव्यद्वारा संस्कृतम्

सरलसंस्कृतेन विरचितम् इदम् पुस्तकं ‘काव्यद्वारा संस्कृतम्’ इति उद्देश्यं प्राप्तुं लोकोपकारि भविष्यति इति आशया ‘महाभारतस्य भाषा - संस्कृतम् आस्वाद्यताम्’ इति कश्चन पाठ्यक्रमः संस्कृत-संवर्धन-प्रतिष्ठानेन निर्मितः अस्ति । ‘महाभारतस्य भाषा’ इत्यनेन ‘महाभारतग्रन्थे प्रयुक्तायाः संस्कृतभाषायाः शैली’ इति अभिप्रायः अस्ति ।

गीतायाः भाषा संस्कृतं पठ्यताम्

अस्मिन् पाठ्यक्रमे गीतायां प्रयुक्तायाः संस्कृतभाषायाः पाठनं क्रियते । गीतायां प्रमुखतया समासस्य, सन्धेः, लोट्लकारस्य, लट्लकारस्य, प्रत्ययानाम् अव्ययानां च बाहुल्येन प्रयोगः दृश्यते । अस्मिन् पाठ्यक्रमे प्रमुखतया चत्वारः भागाः सन्ति ।

योगस्य भाषा संस्कृतं पठ्यताम्

भारतीयेषु षड्सु दर्शनेषु महर्षिणा पतञ्जलिना विरचितम् अन्यतमं ‘योगदर्शनम्’ । इदं दर्शनं प्रमुखं स्थानम् आवहति । युज-समाधौ इति धातोः घञ्प्रत्ययेन योगः इति पदं सिद्ध्यति । अतः योगः नाम समाधिः, तन्नाम परमात्मना परमात्मनः साक्षात्कारः अर्थात् ‘अन्तः विद्यमानस्य आत्मतत्त्वस्य परमात्मतत्त्वेन सह योजनम्’ इति ।

वेदान्तस्य भाषा संस्कृतं पठ्यताम्

सुखं प्राप्तुं प्रयतमानाय मनुष्याय एतानि दर्शनानि मार्गं दर्शयन्ति । अत एव जिज्ञासवः मनुष्याः आ बहोः कालात् विभिन्नानां दर्शनानाम् अध्ययने रताः सन्ति । एतेषु दर्शनेषु अन्यतमम् अस्ति वेदान्तदर्शनम् । वेदानाम् अन्तिमः भागः उपनिषद् एव वेदान्तः इति कथ्यते ।

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